कागजी युग और प्लास्टिक युग

परिवर्तन संसार का नियम है, और संसार एक चक्र की तरह है जो चक्कर लगाता रहता है। न थकता है नथकाता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। सभ्यता के विकास चक्र में पहले ताम्र युग, लौह युग आदि का दौर चलता रहा। वैज्ञानिक प्रगति से हम प्लास्टिक युग तक पहुँच गए। वर्तमान समय में प्लास्टिक का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। यह हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है, जिसका प्रमाण हमें आंध्र राज्य के उस फैसले से देखने को मिल सकता है जिसमें GHMC ने पहले तो प्लास्टिक को पूरी तरह से बैन कर देने का प्रस्ताव रखा, जब उसे समझ में आ गया कि यह एक अभिन्न अंग बन चुका है तो उसे अपने फैसले में कुछ हेरफेर कर 40 micron से कम प्लास्टिक को बंद करने  तक ही सीमित करना पड़ा।
लेकिन हम यह भी कह सकते हैं कि प्राकृतिक रूप से जो नूकसान हमें उठाना पड़ रहा है उसके पीछे प्लास्टिक का भी बड़ा हाथ है। प्लास्टिक हमारे स्वास्थ्य के  लिए बहुत हानिकारक है और यह पर्यावरण प्रदूषण का सबसे प्रमुख कारण है।पहले यानी कुछ वर्ष पूर्व तक दूकानों पर हमें कागज के थैले-थैलियों में रखकर सामान दिया जाता था। आज स्थिति कुछ भिन्न है। दूध की थैली से लेकर सब्जी लाने तक हम प्लास्टिक का उपयोग कर रहे हैं। पहले जहाँ घरों, दूकानों एवं कार्यालयों में जो बर्तन, डिब्बे एवं अन्य जरूरत की वस्तुएँ काम में लाई जाती थीं आज उसका स्थान प्लास्टिकले चुका है और अब जिसका स्थान कागज में परिवर्तित  करने सरकार कार्यरत है।
इसकी सस्ती लागत के कारण इस्तेमाल में पिछले चार दशकों में आई बड़ी  तेजी को देखते हुए हम कह सकते हैं कि कुछ ही सालों में कोई ऐसा देश नहीं होगाजों इसके प्रयोग व उत्पादन पर सोचे पर सरकारी दबाव के कारण कागजी प्रयोग में भी माँग बढ़ सकती है।
अगर हम प्लास्टिक युग का इतिहास देखें तो हमें ज्ञात होगा कि प्रारंभ में प्लास्टिक उतना लोकप्रिय नहीं हुआ था। उस समय इसके प्रयोग को अच्छा नहीं माना जाता था। इसे सिर्फ निर्धनों के प्रयोग की वस्तु समझा जाता था पर आज यह फैशन की तरह उभरा है।
पर हम यह गर्व से कह सकते हैं कि सरकारी पहल के कारण वह पुराना युग लौटते देर नहीं लगेगी जब हम फिर से कागज का प्रयोग होता नजर आएगा।
प्लास्टिक भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे नाइलोन, पोलिस्टर, थर्मोप्लास्टिक, पी.वी.सी. आदि। आजकल तो हम चाइना बाजार के बदौलत कह सकते हैं कि प्लास्टिक का प्रयोग कृत्रिम वस्त्र, मशीनों के पुर्जे, पानी की टंकी, चप्पल, जूते, खिलौने आदि अनगिनत चीजे बनाने में हो रहा है। यहाँ तक की आजकल गाड़ियाँ भी प्लास्टिक से बन कर आ रही हैं।
प्रकृति प्रदत्त धातुओं का भंडार सीमित होता है, जबकि मानव निर्मित भंडार की कोई सीमा नहीं होती। पर हर वस्तु की अति घातक होती है।
मानव ने अपने आप को हर चीजों का आदि बना लिया है, जब प्लास्टिक का दौर चल रहा है तो प्लास्टिक का इस्तेमाल, कागज का युगलौट रहा है तो कागज का प्रयोग आदि
शुरु शुरु में जरा सी परेशानी होती जरूर है पर धीरे धीरे मानव उसका इस्तेमाल जो करने लगता है तो वह उसकी आदत में शामिल हो जाता है। इसलिए हम यह बात जरूर कह सकते हैं कि यहीं सही प्रयोग है क्यों कि जब प्लास्टिक युग था, तब प्लास्टिक का प्रयोग। कागज का युग लौट रहा है तो कागज का प्रयोग। प्राचीन में  जाएँ तो ताम्रपत्र का प्रयोग …
हम यह जरूर कह सकते हैं कि मानव किसी एक वस्तु का गुलाम नहीं वह जिसे इस्तेमाल करने लग जाए, अपने अधीन ले लेता है। फिर चाहे वह प्लास्टिक हो या फिर कागज।