दीपावली

 दीपावली को ज्योति पर्व माना जाता है। दीपावली त्र दीप ़ अवली (पंक्ति या कतार)। दीपावली का लक्ष्यार्थ है‘’’तमसो मा ज्योतिर्गमय।’’ अर्थात् अन्धकार से प्रकाश में जाना। दीपावली पर्व के साथ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक कारण जुडे हुए हैं। धार्मिक कारणों में श्रीराम से जुड़ी कहानी सबसे अधिक प्रचलित एवं मान्यता प्राप्त है। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीराम लंका-विजय के पश्चात् अयोध्या लौटे थे। चैदह वर्ष बनवास के पश्चात् श्रीराम के पुनः अयोध्या आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाकर अपने मन के उल्लास को प्रकट किया था। तभी से दीपावली की परम्परा चल पड़ी। तुलसीदास ने अयोध्या की दीपावली का वर्णन करते हुए ’गीतावली’ मंे लिखा है- दूसरी प्रचलित कथा महादेव एवं महाकाली से सम्बन्धित है। जनश्रुति है कि असुरों के संहार के बाद भी महाकाली का क्रोध शान्त नहीं हुआ। वे जन संहार करने पर तुल गयीं। ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब विश्व का विनाश अत्यन्त निकट है। तब देवाधिदेव महादेव शंकर भगवान् कुपिता काली के आगे लेट गये। कुपिता काली मां का पैर जैसे ही महादेव के वक्ष पर पड़ा कि वह शान्त हो गयीं। इस प्रकार विश्व का विनाश टला। इसी खुशी में दीपावली की परम्परा चल पड़ी। इस प्रकार दीपावली से और भी कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हैं। इन धार्मिक कथाओं के अतिरिक्त कुछ ऐतिहासिक महापुरूषों की घटनाएं भी दीपावली से जुड़ी हुई हैं। स्वामी शंकराचार्य के निर्जीव शरीर में इसी दिन पुनः प्राण-संचार हुआ था। जैन धर्म के 24 वंे तीर्थकर महावीर एवं आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती का निर्वाण इसी तिथि को हुआ था। इससे इस तिथि की महत्ता और भी बढ़ गयी।
        दीपावली पर्व के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। वर्षा ऋतु से हमारे घर सील जाते हैं। चारों तरफ गन्दगी फैल जाती है। हमारे स्वास्थय के दुश्मन मच्छरों एवं मक्खियों की संख्या काफी बढ़ जाती है। वर्षा की समाप्ति एवं मच्छरों के रहने का स्थान समाप्त हो जाता है। इतना ही नहीं, दीपावली में असंख्य दीपों की ज्वाला में अनगिनत मच्छर-कीड़े जल जाते हैं।
        दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनायी जाती है। इसके कुछ दिन पूर्व से ही महिलाएं घरों की सफाई में लग जाती हैं। सुन्दर-सुन्दर रंगों की पुताई से घर सुशोभित हो उठता है। दीपावली की सुबह से ही स्त्रियां घरौंदे सजाने मंे जुट जाती हैं। बच्चे खिलौने, पटाखे एवं मोमबतियों की खरीददारी में व्यस्त नजर आते हैं। हर घर से स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू आने लगती है। घर-घर में लक्ष्मी की पूजा होती है। व्यापारी लोग तो और भी धूमधाम से इस दिन लक्ष्मी-पूजन करते हैं। शाम होते ही क्या शहर, क्या गांव, सभी दीपों की रोशनी से जगमगा उठते हैं। सभी में यह प्रतिस्पर्धा रहती है कि मेरा घर ज्यादा जगमगाता दिखे। इसका कारण इस मान्यता से है कि इस दिन लक्ष्मी घूम-घूमकर यह देखती हैं कि किन-किन घरों में अधिक सफाई, अधिक प्रकाश और उनके प्रति अधिक भक्ति है। जहां-जहां वे अधिक सफाई, रोशनी और भक्ति देखती हैं, वहां वह निवास कर घरवालों को निहाल कर देती हैं।
        प्रत्येक वस्तुत के अच्छे और बुरे दोनांे पक्ष होते हैं। दीपावली जहां आनन्द का पर्व है, वहीं यह दुःख का भी कारण बन जाती है। पटाखे आदि आनन्द के लिए चलाये जाते हैं। परन्तु कभी-कभी असावधानी के कारण उनसे बच्चे जल जाते हैं, झोपड़ियों में आग लग जाती है। इस प्रकार आनन्द और उल्लास का वातावरण शोक में बदल जाता है। अतः पटाखे आदि विस्फोटक छोड़ते समय काफी सावधानी बरतनी चाहिए। इसकी मात्रा भी सीमित ही रखनी चाहिए, अन्यथा वायु एवं ध्वनि प्रदुषण एक साथ उत्पन्न होंगे।
                दीपावली की ओट मंे कुछ लोग अपना सर्वस्व दाव पर लगा देते हैं। लोग उस दिन जुआ खेलते हैं। शराब पीते हैं। लोग दोनों ही घृणित व्यसन अपना लेते हैं। दीपावली के दिन कुछ लोग लक्ष्मी के आगमन की किंवदन्ती के आधार पर रात-भर घर के दरवाजे खोलकर छोड़ देते हैं। इसका परिणाम कभी-कभी उलटा मिलता है। लक्ष्मूीजी के आने के बदले चोर आ जाते हैं। दीपावली के बदले दिवाला निकल जाता है।
                अतः दीपावली के इस पुनीत अवसर पर हमें सभी प्रकार के अन्धविश्वासों, हेय कार्यों का परित्याग कर देना चाहिए। वस्तुतः, दीपावली से प्रेरणा लेकर हमंे शुभ कार्य करना चाहिए, ताकि अभावों में, अंधेरे मे जी रहे सभी लोगों के लिए खुशी का एक दिया जल सके। तभी दीपावली का मुख्य उद्देश्य ’’तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ सार्थक होगा।