ग्रीष्म ऋतु

भारत को अगर भौगोलिक दृष्टि से देखा जाऐ, तो सभी ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु की स्थिति राष्ट्रीय ऋतु की हो जाती है। भारत की बहुसंख्यक आबादी गरीब है। इस बहुसंख्यक आबादी के अनुकूल जो ऋतु होगी, उसे ही राष्ट्रीय ऋतु मानना चाहिए। वर्षा से बचाव के लिए अधिकांश गरीब भारतीयों के पास अपना मकान नहीं होता है। जो भी झोपड़ियां होती हैं, वे वर्षा ऋतु में जब चूने लगती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है कि उन गरीब के भाग्य ही चू रहे हैंै। जाड़े की ऋतु तो धनवान् लोगों के लिए ही है। जाड़ा शुरू होते ही अमीर कीमती ऊनी कपड़े पहनने लगते है। और साथा ही मौसम अनुकूल भोजन भी देह में डालने लगते हैं। इस प्रकार उन लोगों में बाहर से वस्त्र की गरमी और अन्दर से अन्न की गरमी बनी रहती है। दूसरी ओर बेचारे करोड़ों भारतीयों के तन पर न तो वस्त्र की गरमी रहती है। और न ही पेट में अन्न की गरमी। ये गरीब ठण्ड की मार को भगवान् और आग के सहारे इस आशा में काट लेते हैं कि शीघ्र ही ग्रीष्म ऋतु आने वाली है। ऐसे में ग्रीष्म ऋतु के आते ही ये गरीब खुशी से नाचने लगते हैं। कहने को तो चैत्र, वैशाख, जेठ गरमी के महीने हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप में गरमी वर्ष के लगभग आठ महीने रहती है। अतः कहा जाता है कि करोड़ों गरीब भारतवासियों के लिए राष्ट्रीय ऋतु ग्रीष्म ही है।
ग्रीष्म ऋतु में जोरों की गरमी पड़ती है। सभी विद्यालय, महाविद्यालय एवं सरकारी कार्यालय प्रातःकालीन हो जाते हैं। लेकिन सभी प्रान्तों में यह बात लागू नहीं होती। कुछ स्थानों में ठण्ड से बचने के लिए छुट्टियां दी जाती हैं। गरमी की दोपहरी में पृथ्वी तवे के समान तपने लगती है। ऐसे में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। सूर्य की गरमी से तालाब-कुओं आदि का जल सूख जाता है। चारों ओर जल के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। ऐसे में जल की जीवन प्रतीत होने लगता है। ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए सैयद गुलामनवी रसलीन ने लिखा है-धूप चहक करि चेट अरू फौसी पवन चलाई।
मारत दुपहर बीच में यह ग्रीष्म उग आई।।
ग्रीष्म की दोपहरी जितनी कष्टकर और डरावनी होती है, शाम एवं रात्रि उतनी की सुखकर एवं लुभावनी होती है। शाम होने ही लोग घुमने के लिए निकल पड़ते हैं और देर रात तक खुले आसमान और मनभावन वातावरण का आनन्द लेते हैं। बेला, चमेली, रजनीगंधा की खुशबू तो ग्रीष्म की रात्रि की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। ग्रीष्म की चांदनी रात में नौका-विहार में तो आनन्द -ही-आनन्द है। धनी लोग वातानुकूलित कक्ष में समय गुजारते हैं। कुछ लोग बिजली के पंखों की हवा खाते हैं। जबकि गरीब हाथ के पंखे झेलते हैं या पेड़ों के नीचे छाया में विश्राम करते हैं। मिला-जुलाकर औैसत अमीर-गरीब सभी खुले आसमान के नीचे सोकर ग्रीष्म की रात्रि व्यतीत करते हैं।
ग्रीष्म फलों की ऋतु है। फलों का राजा आम भी इसी ऋतु में मिलने लगता है। इसके अलावा लीची, जामुन, शरीफा इत्यादि भी इसी ऋतु की अनमोल फसलें हैं। तपती गरमी में तरबूज का स्वाद किसे अच्छा नहीं लगता है। खीरा, ककड़ी, खरबूजा-ये सभी ग्रीष्म ऋतु की ही उपज हैं, जो तपती गरमी से लोगों को राहत देते हैं।
जे बसन्त को ऋतुराज और वर्षा को ऋतुरानी समझते हैं, उन्हें ग्रीष्म के महŸव को भी कम कर नहीं आंकना चाहिए; क्योंकि ग्रीष्म ही वर्षा की पृष्ठभूमि तैयार करती है। ग्रीष्म के ताप से तपकर ही प्रकृति वर्षा के रूप में करणार्द्र हो उठती है। अतः ग्रीष्म के ताप से अगर धरती नहीं तपेगी, तो समय पर उचित मात्रा में वर्षा भी नहीं होगी, तब कहां वसन्त और कहां उनकी वासन्ती छटा। वसन्र के बाद ग्रीष्म का आगमन यह सन्देश देता है कि मानव-जीवन में सुख के क्षण के बाद दुखःकी घड़ियां भी आती हैं, जिन्हें मानव को सहर्ष झेलना चाहिए  धूप चहक करि चेट अरू फौसी पवन चलाई।
मारत दुपहर बीच में यह ग्रीष्म उग आई।।
ग्रीष्म की दोपहरी जितनी कष्टकर और डरावनी होती है, शाम एवं रात्रि उतनी की सुखकर एवं लुभावनी होती है। शाम होने ही लोग घुमने के लिए निकल पड़ते हैं और देर रात तक खुले आसमान और मनभावन वातावरण का आनन्द लेते हैं। बेला, चमेली, रजनीगंधा की खुशबू तो ग्रीष्म की रात्रि की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। ग्रीष्म की चांदनी रात में नौका-विहार में तो आनन्द -ही-आनन्द है। धनी लोग वातानुकूलित कक्ष में समय गुजारते हैं। कुछ लोग बिजली के पंखों की हवा खाते हैं। जबकि गरीब हाथ के पंखे झेलते हैं या पेड़ों के नीचे छाया में विश्राम करते हैं। मिला-जुलाकर औैसत अमीर-गरीब सभी खुले आसमान के नीचे सोकर ग्रीष्म की रात्रि व्यतीत करते हैं।
ग्रीष्म फलों की ऋतु है। फलों का राजा आम भी इसी ऋतु में मिलने लगता है। इसके अलावा लीची, जामुन, शरीफा इत्यादि भी इसी ऋतु की अनमोल फसलें हैं। तपती गरमी में तरबूज का स्वाद किसे अच्छा नहीं लगता है। खीरा, ककड़ी, खरबूजा-ये सभी ग्रीष्म ऋतु की ही उपज हैं, जो तपती गरमी से लोगों को राहत देते हैं।
जे बसन्त को ऋतुराज और वर्षा को ऋतुरानी समझते हैं, उन्हें ग्रीष्म के महŸव को भी कम कर नहीं आंकना चाहिए; क्योंकि ग्रीष्म ही वर्षा की पृष्ठभूमि तैयार करती है। ग्रीष्म के ताप से तपकर ही प्रकृति वर्षा के रूप में करणार्द्र हो उठती है। अतः ग्रीष्म के ताप से अगर धरती नहीं तपेगी, तो समय पर उचित मात्रा में वर्षा भी नहीं होगी, तब कहां वसन्त और कहां उनकी वासन्ती छटा। वसन्र के बाद ग्रीष्म का आगमन यह सन्देश देता है कि मानव-जीवन में सुख के क्षण के बाद दुखःकी घड़ियां भी आती हैं, जिन्हें मानव को सहर्ष झेलना चाहिए