शरद् ऋतु

 अगर जाड़ा अमीरों का, ग्रीष्म गरीबों का और बसन्त युवाओं का है, तो शरद् अमीर-गरीब, युवा-वृद्ध सबका। सचमुच शरद् ़तु में न तो जाड़े की कड़कड़ाती ठण्ड रहती है और न ग्रीष्म का दहकता ताप। इसमें मौसम समशीतोष्ण रहता है। गरीब-अमीर सभी इसका समान रूप से आनन्द लेते हैं। वर्षा ऋतु के बीत जाने पर शरद् ़ऋतु का आगमन होता है। आश्विन और कार्तिक इसके दो मुख्य महीने हैं। इसके आगमन के सम्बन्ध में रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-
                वर्षा विगत शरद् ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।
                                                (रामचरितमानस: 4-15-1)
        पृथ्वी पर घास का फुला जाना और खंजन पंछी का दिखाई पड़ना शरद् ऋतु के आगमन के ये दो मुख्य लक्षण हैं।
                फूले कास सकल मच्छिाई। जनु वरषा कृत प्रकट बुढ़ाई।।
        और,
                                        जानि शरद् रितु ख्ंजन आये।
                                                                (रामचरितमानस: 4-15-1)
                शरद् ऋतु में बरसात की भांति गलियों में कीचड़ नहीं होते। नदी एवं तालाब के जल निर्मल हो जाते हैं। आकाश साफ रहता है। मन्द-मून्द सुखद वायु चलती है। अगस्त, हार-सिंगार, कुमुद-पुष्पित हो उठते हैं। इन पुष्पों पर भौरों के गुंजन और नाना प्रकार के पक्षियों के कलरव से शरद् ऋतु का दिवस संगीतमय बना रहता है।
                गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुन्दर खग रत नाना रूपा।।
                                                        (रामचरितमानस: 4-15-1)
        शरद् पूर्णिमा की रात्रि का कहना ही क्या, रजनी अपनी काली साड़ी बदलकर श्वेत बन जाती है। शरद्-चांदनी में एक विशेष प्रकार की मादकता होती है। कहा तो यहां तक जाता है कि इन दिनों चांदनी के साथ अमृत की वर्षा होती है। कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि वर्षा ़ऋतु क ेजल से नहायी प्रकृति को शरद् ऋतु ने सुन्दर-सुन्दर वस्त्रों एवं आभूषणों से सुसज्जित कर शोभायमान बना दिया है।
        शरद् ऋतु मनोभावनी ही नहीं होती, अपितु यह अपने साथ अन्नपूर्णा देवी को भी लाती है। भदई एवं अगहनी फसलों से किसानों की कोठियां भर जाती हैं। रवी फसलों की बोआई भी इस ऋतु में होती है। दशहरा, दीपावली एवं छठ जैसे महत्वपूर्ण हिन्दू त्योहार इसी ऋतु में मनाये जाते हैं। वर्षा ऋतु के कारण जो कार्य ठप्प पड़ जाते हैं, वे शरद् ऋतु के आगमन होते ही फिर से आरम्भ कर दिये जाते है राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी सभी अपने-अपने काम में पुनः लग जाते हैं। वर्षा ़ऋतु में पृथ्वी पर कीड़े-मकोड़े एवं अन्य अनावश्यक जीवों में वृद्धि हो जाती है। यह शरद् ऋतु का आगमन होते वैसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे सद्गुरू के मिल जाने पर साधक के भ्रम और सन्देह नष्ट हो जाते हैं।
                        भूमि जीव संकुत रहे, गये शरद् रितु पाई।
                        सदगुरू मिले जाहि जिमि संशय भ्रम समुदाई।।
                                                        (रामचरितमानस: किष्किन्धा काण्ड)
        शरद् रात्रि की सुन्दरता तो और भी मनोभावनी होती है। मेघों से रहित निर्मल आकाश तारों की ज्योति से वैसे ही जगमगा उठता है, वैसे सत्वगुणी चित्रवेदों का अर्थ समझ जाने पर शोभायमान हो जाता है।