सोनिया गांधी

9 दिसंबर 1946 को इटली के नगर तुरीन में एक बहुप्रतिभाशाली, त्याग की मूर्ति वाली कन्या ने जन्म लिया। शायद ही किसी ने स्वप्न में भी विचार किया हो कि वह बच्ची बड़ी होकर संसार की एक ऐसी महान नारी बनेगी जो भारत के राजनीतिक क्षेत्र में अनोखा कीर्तिमान स्थापित करेगी। उसका नाम एंतोनिया माईनो रखा गया।
बड़ी होकर माइनो इंग्लैण्ड की राजधानी लंदन के प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षा के लिए गईं। उस समय यह विश्वविद्यालय संसार भर में प्रसिद्ध था। इंगलैण्ड के लगभग तमाम प्रधानमंत्री इसी के छात्र हुआ करते थे। आजादी से पहले भारत के अमीर घरानों के युवक इसी के छात्र हुआ करते थे। जो उस समय एक गौरव की बात थी। इंदिरा गांधी भी इसी विश्वविद्यालय में पढ़ चुकी हैं। पर अपनी माँ कमला नेहरू जी की बीमारी के कारण उन्हें पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। वे राजीव को भी इसी विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए भेज रहीं थी। दोनों की मुलाकात वहीं हुई थी। भारत आकर राजीव ने मनोभावना अपनी माँ से व्यक्त की और माईनों के साथ विवाह की बात छेड़ी। माँ ने कुछ ना-नुकर के बाद आज्ञा दे दी। यह अंतर्जातीय और अंतर्राष्ट्रीय विवाह वैदिक रीति-रिवाज के मुताबिक दिल्ली में सन् 1968 में संपन्न हुआ। ।
विवाह के पश्चात् राजीव ने माईनों को भारतीय नाम सोनिया गांधी दे दिया। सन् 1970 में उन्हें एक पुत्र का जन्म प्राप्त हुआ, जिसका नाम राहुल रखा गया और दो वर्ष के बाद सन् 1972 में पुत्री प्रियंका का जन्म हुआ।
सोनिया जी एक आदर्श भारतीय नारी सिद्ध हुईं। सन् 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। उनके अंगरक्षकों ने जिन्हें वे पुत्र समान समझती। थी, वे ही उनके कत्ल में शामिल थे। इस घटना के पश्चात शन्य पद पर राजीव को बिठाया गया। राजनीति का अनुभव उन्हें तो था ही नहीं। उनके कार्यकाल में सिख सम्प्रदाय के विरूद्ध दिल्ली और देश के अन्य भागों में दंगे भड़क उठे। अनुभवहीन होते हुए भी राजीव एक सफल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए। सोनिया को कभी भी अभिमान नहीं रहा कि उनके पति प्रधानमंत्री हैं। दुर्भाग्यवश सन् 1991 में वे विधवा हो गई।
राजीव की हत्या के बाद काँग्रेस की दशा शोचनीय हो गई। कोई ऐसा योग्य  नेता नहीं था जो इसडगमगाती पार्टी को स्थिर कर के। सोनिया जी पार्टी के कार्यकत्ताओं
और नेताओं के अनुनय-विनय पर नेहरू-गांधी परिवार की विरासत को संभालने के लिए सन् 1998 से राजनीति में सक्रिय भाग लेने लगीं। सन् 1984 में भारत की नागरिकता वह प्राप्त कर चुकी थीं। रायबरेली चुनाव क्षेत्र में सन् 1999 में यू.पी. के | सांसद पद पर चुनी गईं।
जनता ने उनका स्वागत किया और वे ऐसी चौथी महिला हैं जिन्हें यह गौरव | प्राप्त हुआ है। डगमगाती हुई काँग्रेस पार्टी में नई जान फेंक दी। 14 वें लोकसभा । चुनाव में इतने प्रभावशाली ढंग से चुनाव प्रसार किया कि केवल ढाई लाख मतों से स्वयं विजय हासिल की। पार्टी के खाते में इकतीस सीटें और बढ़ा दीं। वह संसदीय दल की नेता चुनी गईं। उनके बेटे राहुल भी पीछे नहीं रहे, वे भी भारी बहुमत से | विजयी हुए। प्रियंका को राजनीति में दिलस्पी नहीं थी, वे शुरू से ही अलग रहीं।।
त्यागमूर्ति वे तब बनीं जब 18 मई 2004 की दोपहर को सोनिया जी राष्ट्रपति से मिलीं। उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति को बताया कि इस लोकसभा में उनका बहुमत है। 12 दलों के सांसदों ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) अथवा यूपीए कायम किया है। उसकी वे चेयरपर्सन चुनी गई हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का अपना दावा पेश किया। राष्ट्रपति को इसका विश्वास हो जाने पर उन्होंने सोनिया जी को आमंत्रित किया कि वे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने आएं। शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां जोरों पर थीं, अनुमान भी लग गए की कौन-क्या संभालेगा। सोनिया ने पार्टी के नेताओं की महात्वपूर्ण मीटिंग बुलाई और जो कहा वह सुनकर सब सून्न पड़ गए। उन्होंने कहा- मैं देश की प्रधानमंत्री नहीं बनेगी! जिस पर सभी नेतागण बोल उठे- मैडम जी, आप क्या कह रहीं हैं? यह भला कैसे हो सकता है। सोनिया ने कहा यह मेरी अंतरात्मा को आवाज है। मैंने अपने मनसेसला किया कि यदि कभी मुझे यह मौका भी मिला, तो में पद त्याग देगी। ऐसो त्यागमूर्ति हैं। | सोनिया गांधी।।
ऐसे कई उदाहरण उनके जीवन में हम देख सकते हैं जिनके आधार पर यह | कह भी सकते हैं कि सोनिया ही त्यागमूर्ति का सच्चा स्वरूप हैं, अर्थ हैं।