विनाशकारी भूकम्प


प्रस्तावना : प्रकृति की महिमा अनन्त है। उसमें एक ओर तो जीवन देने, उसका पालन-पोषण करने की असीम शक्ति छुपी हुई है, तो दूसरी ओर पलक झपकते ही सब कछ। तहस-नहस कर देने की अपार क्षमता भी विद्यमान है। आज का ज्ञान-विज्ञान प्रकृति के सभी तरह के रूपों-रहस्यों को जान एवं सुलझा लेने का दावा अवश्य करता है; पर उस की महती सत्ता और शक्ति के सामने आज भी मानव कितना बौना है, अक्सर इस बात का पता चलता है। यो सामान्यतया प्रकृति के दो मुख्य रूप माने गए हैं। उसका अधिक व्यापक, प्रत्यक्ष एवं प्रिय लगने वाला रूप है कोमलकान्त और दूसरा, कभी-कभी प्रकट होने वाला रूप है अत्यन्त अप्रिय, कुरूप और कठोर । भयानक वर्षा और उसके कारण आने वाली बाढ़, सूखा, आँधी और तूफान आदि प्रकृति के ऐसे ही रूप हैं। भूकम्प या ज्वालामुखी, फटना जैसे रूप भी इस कठोर- भयानक रूप के अन्तर्गत ही आते।
भूकम्प : कारण : विज्ञान-वेत्ताओं के अनुसन्धानों के फलस्वरूप ऐसा माना जाता है कि ऊपर जड़ और स्थिर दिखाई देने वाली धरती के नीचे हमेशा कई प्रकार की रासायनिक क्रिया-प्रक्रियाएँ चलती रहा करती हैं। जैसे सागर के भीतर और सतह पर भी लहरों के हल्के-गहरे उफान हमेशा मचलते रहा करते हैं, उसी प्रकार धरती की ऊपरी सतह के नीचे कई प्रकार के लावे भी लहरों की तरह। मचल मचल कर भिन्न प्रकार की हलचल हमेशा मचाए रहते हैं। दैवयोग से कई बार ऐसा भी हो जाया करता है कि एक-दूसरे से विभिन्न स्वभाव, गुण-कर्म वाले लावे विपरीत दिशाओं से मचलते आकर किसी एक बिन्दु पर अचानक टकरा जाया करते हैं। उस बिन्दु पर पहले से भी विभिन्न तत्त्व सक्रिय रहकर विपरीत परिस्थितियाँ बना चुके होते हैं। तब उन लावों की टकराहट अचानक भीतर ही भीतर धरती को कंपकपा दिया करती है। वह कम्पन ही भूकम्प है। उसी के प्रभाव से काँप कर धरती अनेक स्थानों से फट जाया करती है। फलतः वहाँ सतह पर स्थित सभी कुछ टू-फूट कर तबाह एवं बर्बाद हो जाया करता है। बहुत कुछ फटी या दरारी धरती में समा जाता है। उसके प्रभाव-क्षेत्र में आने वाला सब टूट-फूट कर बिखर आता है। उस बिखराव या धरती के फटाव-दरार आदि में आने वाला प्रत्येक प्राणी अक्सर मृत्यु का शिकार हो जाया करता है। ऐसा सब होना ही भूकम्प कहलाता है।
भूकम्प : विनाश-लीला : बड़े-बूढे तो बताते ही हैं, पुस्तकों में से भी पढ़ने को मिलता है कि साठ-सत्तर वर्ष पहले अविभाजित भारत के कोयटा नामक स्थान पर उस सदी का भयानकतम माना जाने वाला भूकम्प आया था। उसने समूचे प्रभावित क्षेत्र को निगल कर एक भयावह विनाश-लीला उपस्थित कर दी थी। घरों समेत पूरे के पूरे परिवार फटी धरती में समाकर जीवित दफन हो गए थे। बाद में खुदाई करने पर उनके शव ऐसे भी निकले जो पूरी तरह सुरक्षित थे, मात्र सो रहे प्रतीत होते थे। यदि समय पर उन्हें निकाला जा सकता, तो बच सकते थे। हम शायद कल्पना भी नहीं कर सकते कि जिन्दा दफन होकर उन्होंने अपनी एक-एक साँस कैसे पूरी की होगी ? किसे शिद्दत से मृत्यु को कदम दर कदम अपने समीप आते देखा होगा। विगत वर्षों में हमारे देश को लगभग उसी प्रकार के दो भूकम्पों। की चोटीली विभीषिका में से गुजरना पड़ा है। पहली बार उत्तर-प्रदेश के गढ़वाल सम्भाग के पर्वतीय निवासियों को भूकम्प की करारी चोट से आहत होना पड़ा। एक तो पहाडी प्रदेश में पड़ने वाली भयावह सर्दी, उस पर भूकम्प द्वारा तहस-नहस और धराशायी कर दिए गए। घरों, से रहित वहाँ के निवासी; अन्न-जल, अग्नि-ताप और सिर पर छतों का अभाव- कैसे काटा होगा उन भूकम्पपीड़ितों ने वह दर्दीला समय अपना सब कुछ-गंवाकर, समाचारपत्रों में उनकी लोमहर्षक कहानी पढ़कर हम लोग मात्र अनुमान ही करते रहे ; उस वेदना को तो शायद छू भी न पाए होंगे जो भूकम्प पीड़ित क्षेत्रों के निवासियों ने झेली होगी।
उसके बाद महाराष्ट्र के एक भाग में वहाँ के निवासियों को भूकम्प की उस प्रकार की दर्दनाक स्थिति और विनाश-लीला का सामना करना पड़ा, वह दृश्य उससे कहीं अधिक भयावह था जैसा कि हमें समाचारपत्रों में पढ़ने को मिला करता है। भूकम्प पीड़ित लोगों की आँखों में अपनी असहायता, विवशता के साथ भोगे गए सत्य की स्थिति का जो उभार था, उस तरफ देख पाना भी संभव नहीं था, वर्णन कर पाना तो कतई नहीं। दाने-दाने को मोहताज हो रहे पीडित जन, दूध की एक-एक बूंद के लिए तरसते बच्चे, अजीब-सा भय-विस्मय का भाव लेकर अपने घरों के खण्डहरों की ओर देखती गृहिणियाँ, उनमें मच रही हाव-तोबा, दब-भिच कर मृत्यु का शिकार हो गए सगे-सम्बन्धियों के लिए नाम ले-लेकर अनवरत रोदन, सभी कुछ रोंगटे खड़े कर देने और कभी भी न भूल पाने वाला विनाशकारी दृश्य था।
राहत और जन व्यवहार : समाचारपत्रों में भूकम्पपीड़ितों के लिए सभी प्रकार की राहत तत्काल पहुँचाने के समाचार छप रहे थे, नौकरशाहों के काफिले भी वहाँ आ रहे थे; पर वास्तविक राहत पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने ताम-झाम का रोब दिखा कर पहले से पीड़ितों को और अधिक आतंकित करने के लिए, थोड़ी बहुत राहत बँट रही थी ; पर अधिकाँश बाँटने वाले दरिन्दों के जबड़ों में समाकर मानव और सरकार की हृदयहीन खानापूर्ति की कहानी कह रही थी। स्वयंसेवी संस्थानों के कुछ कार्यकर्ताओं को छोड़कर आमलोगों का व्यवहार भी पीड़ितों के प्रति मात्र लफ्फाजी से अधिक कछ नहीं था। था भी, तो भूखों-नंगों की तरह उन बेचारों के तन-मन सभी कुछ लूट लेने का वास्तव में पीड़ितों को अपने हाल पर छोड़ दिया। गया था।
उपसंहार : अपने आप को सभ्य-सुसंस्कृत, शिक्षित, ज्ञानी-विज्ञानी कह कर भी आज का मानव भीतर से कितना भूखा और नंगा हो गया है; एक दम सम्वेदना शून्य जड़ पत्थर बन चुका है, इस बात का अनुभव मुझे इस अवसर पर पहली बार हुआ। सिर शर्म से झुक कर विवश सोचता रहा-प्रकृति की गाज ऐसे हृदयहीन स्वार्थियों के सिर पर क्यों नहीं गिरती कि जो मुसीबत के मारों के नाम पर भी कमाई ही करना चाहते हैं ?