बढ़ती महँगाई


प्रस्तावना : हमारे निजी स्वार्थों एवं संकीर्ण मनोभावनाओं ने हमारे सम्मुख अनेक नवीन समस्याओं को जन्म दिया है, इन्हीं समस्याओं में ‘मूल्य वृद्धि’ अनाहूत अतिथि के समान हमारे जीवन में आकर बलात् बैठ गई है। हमारे भारतवर्ष में तो इस मूल्य वृद्धि से अन्य देशों की अपेक्षा जन-जीवन बहुत ही त्रस्त हो गया है। इस महँगाई ने सम्पूर्ण समाज के ढाँचे को ही जर्जर कर दिया है।
मूल्य वृद्धि का अर्थ : यह मूल्य वृद्धि क्या है ? क्या आज से पचास वर्ष पूर्व जो वस्तु हमें सौ रुपये में मिलती थी, आज भी उसी भाव में मिले, यह हम चाहते हैं, नहीं। मूल्य का आभास तो हमें उस समय विशेष रूप से होता है, जब एक ही वस्तु एक दुकान पर सस्ती और दूसरी पर महँगी मिलती है। उदाहरण स्वरूप जो चीनी सस्ते गल्ले की दुकानों पर 18 रुपये 50 पैसे किलो मिलती है वही अन्य दुकानों पर 20-22 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकती है। इसी प्रकार आटा, चावल आदि अन्य खाद्य पदार्थों एवं साबुन, तेल आदि दैनिक प्रयोग के अन्य पदार्थों में भी सस्ते गल्ले की दुकानों की अपेक्षा अन्यत्र दुगुना-तिगुना अन्तर पाया जाता है। आज का प्रत्येक विक्रेता अधिक से अधिक लाभ कमाने के चक्कर में है। किसी वस्तु के भाव की वृद्धि का प्रसारण हुआ, तो तुरन्त विक्रेता पहले से दुकान पर वर्तमान वस्तु के दाम एकदम बढ़ा देता है। नवीन वस्तु यदि वह महँगी खरीदे तो उसे अधिक मूल्य कर देना चाहिए या पुरानी वस्तु को उसी पिछते भाव में देना चाहिए। परन्तु कभी-कभी तो दूकानदार बढ़े मूल्य से भी अधिक मूल्य पुरानी वस्तुओं पर ले लेता है, यही अधिक लाभवृत्ति ही मूल्यवृद्धि कहलाती है।
परिस्थिति तथा प्रभाव : हमें अपनी भारतीयता पर गर्व था। हमारी संस्कृति बड़ी महान् थी। हमारे पूर्वजों का आदर्श ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ था; परन्तु आज हम अपने पूर्वजों के पद चिहनों पर नहीं चल पा रहे हैं। परिणामतः परिस्थिति बड़ी भयंकर हो रही है। इसका सर्वग्राही प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ रहा है। आर्थिक समस्याओं के कारण धार्मिक विश्वास विशंखलित हो रहे हैं। सामाजिक बन्धनों में शैथिल्य होने के कारण दुराचार एवं अनाचार जैसे भयावह शत्रु पनप रहे हैं। आज के भ्रष्ट्र युग में सांस्कृतिक मान्यताएँ भी बदल
रही हैं। कमरतोड़ महँगाई की बढ़ोतरी से जीवनयापन के खर्च में वृद्धि होती है जिससे मजदूर भी अधिक वेतन की याचना करते हैं। व्यापारी अपने लाभ का अंश और भी अधिक बढ़ा देता है। सरकार करों की दर बढ़ा देती है, फलस्वरूप महँगाई और बढ़ जाती है। हम साधारण जन जीवनयापन के लिए त्रस्त हो उठते हैं।
मूल्य वृद्धि के कारण : महँगाई की व्यापकता को देखकर उसके कारणों को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। विचार करने पर अनेक कारण दृष्टिगोचर होते हैं, जिनमें से मुख्य इस प्रकार हैं :

  • उत्पादन में कमी : अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि यदि उत्पादन कम हो और उपभोग या माँग अधिक हो, तो मुल्य की स्वाभाविक रूप से वृद्धि होती है। परन्तु सरकारी आँकड़ों के अनुसार आज वस्तुओं का उत्पादन घटा नहीं अधिकता में बढ़ा ही है। कपड़े का उत्पादन पहले की अपेक्षा दो या तीन गुना बढ़ा है, इसी प्रकार साबुन, घी और दियासलाई आदि का उत्पादन भी बढ़ा, साथ ही मूल्य में भी वृद्धि हुई ऐसा क्यों ? यद्यपि हड़तालों से उत्पादन में अवश्य कुछ बाधा पड़ रही है; परन्तु फिर भी मूल्य वृद्धि के अन्य अनेक कारण हैं
  • (ii) व्यापारी वर्ग द्वारा मुनाफाखोरी तथा जमाखोरी की प्रवृत्ति : विशेष रूप से व्यापारी वर्ग इस समस्या को भयंकर बनाने में भरसक प्रयत्नशील है। वह वस्तुओं को अवैध रूप से जमा करता है और फिर बाजार में कृत्रिम अभाव उत्पन्न कर देता है। आज का भौतिकवादी मानव वस्तुओं को खरीदने के लिए विवश होकर उसके बढे मूल्यों पर वस्तुओं को खरीदता है।
  • काला धन : बाँचु कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश में सात हजार करोड़ रुपयों का काला धन है। इस धन से अनुचित रूप से जमाखोरी, करों की चोरी तथा विदेशों में तस्करी व्यापार हो रहा है, जिससे मूल्य वृद्धि हो रही है।
  • खाद्यानों के रख-रखाव का अभाव : हमारे देश में । किसानों को फसल पकने के बाद उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता आधे से ज्यादा माल तो खरीदारों के अभाव में खराब हो जाता है या । कम मूल्य के कारण मालिक उसे बेचता नहीं। देश में खाद्यानों के रख-रखाव का भी अभाव है। सैकड़ों टन आलु, प्याज आदि बिना उचित रख-रखाव के खराब हो जाता है तथा बाद में इनके अभाव में मूल्य वृद्धि होती है।
  • जनसंख्या की वृद्धि : गत शताब्दी से भारत की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसके लिये अधिक अन्न व वस्त्रादि की आवश्यकता पड़ती है। हमारी सरकार इसकी पूर्ति के लिये जितने प्रयत्न करती है, वह सब बढ़ोतरी की मात्रा में न्यून पड़ जाते हैं। आवश्यकता से कम वस्तुओं की उपलब्धि होने से मूल्य वृद्धि का होना स्वाभाविक है।
  • दोषपूर्ण वितरण प्रणाली : देश में वितरण का प्रबन्ध भी उचित नहीं है। बहुत-सी वस्तुएँ, तो मार्ग में तथा गोदामों में ही नष्ट हो जाती हैं, जिससे वस्तुओं की कमी होने पर महँगाई हो जाती है ।
  • भ्रष्टाचार : भ्रष्टाचार के कारण भी तेजी आती है। लोगों की भ्रष्ट नीतियों से विकास योजनाएँ समय पर पूर्ण नहीं हो पाती हैं। पुलों व सड़कों आदि को मिलावट के सीमेंट आदि से बनाया जाता है, जिससे वे जल्दी टूट जाते हैं और उनको पुनः बनवनि में पर्याप्त व्यय होता है। इससे सामान का अभाव होता है और तेजी की वृद्धि होती है।
  • खेती का पिछड़ापन : भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनता कृषि करती है फिर भी इतनी निम्न कोटि की कृषि यहाँ पर की जाती है कि भरपेट भोजन भी हम नहीं कमा पाते। प्रतिवर्ष लाखों टन अन्न तथा कपास विदेशों से आता है। यह अन्न तथा कपास यहाँ आकर खर्चे लगकर महँगा पड़ता है। अतः महँगाई बढ़ती है।
  • कर्त्तव्य भावना का अभाव : आज हम लोगों के अन्दर कर्तव्य-पालन की भावना का अभाव है। हम अपने स्वार्थ के लिये जरूरत से अधिक वस्तुओं का एकत्रीकरण कर लेते हैं। बाजार में वस्तुओं में न्यूनता आने पर महँगाई बढ़ती है। हम भी बेच कर उसका लाभ उठाते हैं।
मूल्यवृद्धि के परिणाम : महँगाई को यदि हम [ष्टाचार की। जननी कहें, तो अतिशयोक्ति न होगी। आज हम देख रहे हैं, कि इस मूल्य वृद्धि के पिशाच ने देशवासियों के उत्साह की कमर ही तोड़ दी। है। आजकल आये दिन वेतन वृद्धि और भत्ता-वृद्धि आदि की माँगों को लेकर हड्ताले की जा रही हैं, वेतन-भत्ता बढ़ाये भी जा रहे हैं; किन्तु परिणाम कुछ नहीं निकल रहा है। कहावत चरितार्थ हो रही है‘ज्यों-ज्यों दवा की रोग बढ़ता ही गया ।’ मूल्य वृद्धि के अनेक दुष्परिणाम हैं जिसमें से कुछ निम्न हैं :
  • जीवन-यापन में कठिनाई : अत्यधिक महँगाई के कारण मनुष्य का जीवित रहना दूभर हो गया है। जो वस्तु पहले 1 रुपए में। आती थी, अब उसके लिए आँकड़ों के अनुसार 20-22 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। कपड़ा, घी, अनाज तथा तेलों के दाम इतने अधिक बढ़ गए हैं कि जनता त्राहि-त्राहि कर रही है ‘भा भ्रष्ट सारा संसारा। अब जीवन का नहीं पारा ।’ साथ ही विलासप्रिय वस्तुओं के मूल्य तो चोटी पर पहुँच रहे हैं। सबसे अधिक दयनीय दशा तो मध्यम वर्ग की है जो पता नहीं किस प्रकार बड़ी मुश्किल से अपने दिन काट रहा है ।
  • भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन : जब मध्यम वर्गीय मानव अपनी प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में कठिनाई का अनुभव करता है, तो वह भ्रष्ट साधनों में लिप्त हो जाता है और रिश्वत लेता है तथा अन्य नियम-विरुद्ध कार्य भी करता है। मूल्यवृद्धि होने से कन्ट्रोल, राशन, कोटा और परमिट आदि लागू होते हैं, उनमें भी भ्रष्ट तरीके अपनाए जाते हैं। सभी लोग मुनाफाखोरी तथा माखोरी की बहती गंगा में हस्त प्रक्षालन कर रहे हैं। इसीलिए देश में काले धन का बोलबाला है। सभी लोग अवैध संग्रह करके कृत्रिम अभाव बनाकर धन संग्रह कर रहे हैं।

मुल्य नियन्त्रण के उपाय : मूल्य वृद्धि के दुष्परिणामों को देखकर, यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या अति विकराल है इसका समाधान करना ही होगा । अत: मूल्यवृद्धि के समस्त कारणों को दूर करने के लिए निम्न उपाय हैं :
  • जनसंख्या पर नियन्त्रण : यद्यपि सरकार ने परिवार नियोजन विभाग’ तो खोल रखा है; परन्तु कार्य जितना होना चाहिए। उतना नहीं हो रहा है। यदि सही अर्थों में यह कार्य पूर्ण हो जाए तो वस्तुओं की कमी नहीं होगी और मूल्य वृद्धि पर अंकुश लग जाएगा।
  • उत्पादन में वृद्धि : सरकार को कृषि उत्पादन तथा उद्योग धन्धे पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिससे वस्तुओं की मात्रा बढेगी, तो कीमतें स्वयं ही कम हो जाएगी ।
  • बहिष्कार प्रवृत्ति : उपभोक्ता संग्रह वृत्ति व अधिक मूल्य की वस्तुओं का बहिष्कार करें.। गृहिणियाँ कम संग्रह व कम वस्तु में कार्य चलाने का प्रयास करें, इससे मूल्य वृद्धि रुकेगी ।
  • कानून द्वारा : सरकार एवं जनता दोनों को चाहिए कि जमाखोर एवं मुनाफाखोर व्यापारियों के प्रति कडा व्यवहार करें । सरकार इनको पर्याप्त दण्ड दे तथा जनता इनकी समाज में भर्सना करे। इससे सम्भव है कि कुछ सुधार हो । वैसे बड़े सौभाग्य की बात है कि हमारी भारतीय सरकार का इधर ध्यान गया है। आजकल तस्करों को पकड़ने का अभियान बड़े जोर से चल रहा है।
  • चरित्र व नैतिकता का विकास । आन्तरिक शुद्धि की उपेक्षा चरित्र का विकास आवश्यक है। यदि चरित्र विकसित होगा तो भ्रातृत्व की भावना से हम थोड़े से ही में से मिल-जुलकर बाँट कर खा लेंगे, जिससे मूल्यवृद्धि न होगी।
उपसंहार : हमारी जनप्रिय सरकार महँगाई रोकने के अनेक प्रयत्न कर रही है। उद्योगों तथा कृषि के लिए विकास योजनाएँ बन रही हैं। देश में सुपर बाजार तथा उपभोक्ता भण्डार खोले गए हैं। सरकार को वितरण प्रणाली में भी ‘आमूल-चूल परिवर्तन करना चाहिएं। यद्यपि देश के बड़े-बड़े नेता, शिक्षाविद्, अर्थशास्त्री एवं कर्मनिष्ठ प्रशासक महँगाई की विकराल समस्या के समाधान में तत्पर हैं। वास्तव में विश्व में इसी से कल्याण भी सम्भव है अन्यथा मूल्य वृद्धि का यह द्रोपदी चीर सबको ढक लेगा और मध्यम वर्ग को नौन-तेल-लकड़ी की, चिन्ता बनी रहेगी और वह प्राचीन भक्तों की भाँति प्रार्थना करता रहेगा।