गंगा का प्रदूषण

प्रस्तावना : “गंगा हिमालय से निकली है। हिमालय भारत की उत्तरी सीमा का प्रहरी है। गंगा जल बड़ा ही पवित्र, पापहारक माना जाता है।” इस प्रकार के वाक्य हम बचपन से ही सुनने और पढ़ने लगते हैं। भारतीय जन-मानस – में गंगा का स्थान देवी और माता के समान संस्कार रूप से बसा हुआ है। माना और कहा जाता है कि गंगा-स्नान और गंगा जलपान करने से युग-युगों के पापों का नाश हो जाता है। पापी-से-पापी व्यक्ति का भी उद्धार हो जाया करता है। गंगा की उत्पत्ति के बारे में पौराणिक-कथा प्रसिद्ध है कि इसकी उत्पत्ति भगवान् विष्णु के दाएँ पैर के अँगूठे के नाखून से हुई । अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए महाराज भागीरथ ने जब घोर तप किया, तब यह गंगा पहले ब्रह्मा के मण्डल में आई, फिर उसे भगवान् शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया। तब हिमालय के कैलाश शिखर से उतर कर यह रांगा धरती पर आई और। महाराज भागीरथ के पीछे बहकर उनके पूर्वजों का उद्धार करते हुए धुर दक्षिण तक चली गई। इस प्रकार की धार्मिक-सांस्कृतिक कई तरह की आस्थाओं से जुड़ी गंगा आज प्रदूषित होकर शायद अपने मूल स्वभाव एवं गुणों से प्रवंचित होती जा रही है।
गंगा जल का महत्त्व : जिस किसी भी कारण से हो, गंगा जल पवित्र तो माना ही जाता है, वर्षों तक किसी बोतल-बर्तन आदि में बन्द पड़ा रह कर भी कभी दुर्गन्धित दूषित या खराब नहीं हुआ करता और सूखता भी नहीं। धार्मिक आध्यात्मिक चेतना वाले लोग उसे स्वर्ग से धरती पर उतरी मान कर, उसके दैवी गुणों को इसका कारण मानते हैं: जबकि आधुनिक विज्ञान-वेत्ताओं का यह मानना है कि गंगा के निकास-स्थान और तल में ऐसे औषधीय एवं वानस्पतिक तत्त्व विद्यमान हैं कि वे वर्षों तक बन्द रहने के कारण ही गंगा जल को दुर्गन्धित एवं दूषित नहीं होने देते। उसमें दैवी गुण रहने के कारण ही । भारत में आसन्न मृत्यु वाले मुँह में गंगा-जल डालने की परम्परा है।
इसी प्रकार प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में इसका प्रयोग, किया जाता हैं। इस प्रकार दैवी या वानस्पतिक औषधीय, कोई भी कारण क्यों न हो, अनन्तकाल से गंगा का सम्बन्ध भारतीय जन-मानस के साथ जुड़ा हुआ है। अनन्तकाल से मृतक के अस्थि-अवशेषों का अन्तिम विसर्जन भी गंगा में ही किया जाता रहा है। हमारी अनंत आस्थाओं, धारणाओं से जुड़ी अध्यात्म-साधना और संस्कृति की प्रतीक गंगा के आज प्रदूषित हो जाने का खतरा सिर पर मण्डरा रहा है।
प्रदूषण के कारण : वनों का कटाव, पहाड़ों का नंगे हो जाना, वनस्पतियों एवं औषधियों का पहले दो कारणों से क्रमशः समाप्त हो। जाना, तरह-तरह के आणविक परीक्षणों का वायुमण्डल पर पड़ने वाला प्रभाव और धूल-धुआँ आदि तो पर्यावरण के अन्य रूपों के समान गंगा जल को भी प्रदूषित कर ही रहे हैं; लेकिन गंगा-प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण स्थान-स्थान पर तरह-तरह की गन्दगी ढोकर लाने वाले गन्दे नालों का उसके बहाव में आकर गिरना माना जाता है। उन नालों में मल-मूत्र तथा घरों और बाजारों आदि की गन्दगी तो रहती ही है, कल-कारखानों से निकलने वाले रासायनिक पानी तथा कचरे की गन्दगी भी रहती है। इस प्रकार के बहुत अधिक मात्रा में बह कर पड़ने वाले दूषित तत्त्वों के इसी तरह निरन्तर पड़ते रहने से। इस बात की पूरी सम्भावना है कि एकदम गंगा अपने वर्तमान स्वरूप का परित्याग कर के पूर्णतया एवं समग्रतः गन्दा नाला ही न बन जाए, चन्ता का मुख्य कारण यह माना जा सकता है। प्रायः सभी औद्योगिक नगर भी इसी के तटों पर बसे हैं, जो अपने उच्छिष्ट एवं अवशिष्ट से इसको प्रदूषित कर रहे हैं। वास्तव में स्थिति निरन्तर चिन्तनीय होती जा रही है।
प्रदूषण मुक्ति के उपाय : भारतीयता का प्रतीक देवी रूपा गंगा का जल प्रदूषित न हो, इसके लिए तत्काल चहुंमुखी सार्थक उपाय करना आवश्यक है। गंगा को साफ़ करने, उसमें पड़ने वाले गन्दे नालों की धारा बदलने का एक प्रयास किया भी गया था; पर वह कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गया, जबकि आवश्यकता व्यापक स्तर पर गंगा के समूचे प्रदेश और किनारों पर योजनाबद्ध उपाय करने की है। वे उपाय गंगा-तल की वैज्ञानिक ढंग से सफाई करना तो है ही, उसमें गिरने वाले छोटे-बड़े सभी गन्दे नालों के प्रवाह को रोकना या उसके दूषित जल का गंगा में गिरने से पहले वैज्ञानिक शुद्धि करना बहुत जरूरी है। ऐसा करके ही उसकी पवित्रता, उसके औषधीय गुणों की सुरक्षा कायम रखी जा सकती है, अन्य कोई उपाय नहीं।
उपसंहार : गंगा भारतवासियों की चेतना भावना में बसी है। इस कारण वह मात्र एक जड़ नदी ही नहीं है। वह एक सचेतन जीवन-धारा की प्रतीक है। जीवन को स्वस्थ, सचेतन एवं अनवरत गतिशील बनाए रखने के लिए गंगा-धारा को प्रदूषण-रहित बनाया। जाना बहुत ही आवश्यक है। इसके लिए आज अपने समस्त साधनों के साथ कमर कस कर जुट जाना चाहिए।