विद्यार्थी और राजनीति

प्रस्तावना : एक विद्वान् ने लिखा है कि राजनीति एक वरवधू (वेश्या) है, जो समय पर किसी को अपना पति बना सकती है। यह  कथन सर्वथा सत्य है। किसी समय श्री जवाहरलाल नेहरू, श्री चर्चिल की दृष्टि में अपराधी और कैदी थे, एक दिन वही चर्चिल के घर में अतिथि बनकर सम्मान पा रहे थे। रूस के कई उच्च अधिकारी एक दिन कोर्ट मार्शल कर दिये जाते हैं। खुश्चेव को ही देख लीजिये। एक दिन रूस उनके इंगित पर नाचता । था और आज समाचारपत्रों में उनका नाम भी नहीं। यह सब क्या है? राजनीति रूपी राक्षसी का माया-जाल ही तो है। ऐसी पिशाचिनी की। छाया भी छात्रों पर न पड़े, यही प्रत्येक सविचारक चाहता है।
राजनीति का ज्ञान, समय और स्थिति : विद्यार्थियों को राजनीति का ज्ञान सक्रिय राजनीति से दूर रहकर भी कराया जा सकता है। साँप से कटवा कर किसी को सर्पदंश की चिकित्सा सिखाना क्या बुद्धिमानी है ? किसी के पेट का ऑपरेशन कर, उसे शल्यचिकित्सा सिखाना क्या पाण्डित्य है ? किसी को विष खिलाकर विष का ज्ञान कराना क्या योग्यता ?
जब कौरव और चारों पाण्डव लक्ष्य-भेद न कर सके, तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन से पूछा, “बेटे ! तुम्हें क्या दिखाई देता है ?” अर्जुन बोला, “गुरुदेव ! मुझे वह लक्ष्य मात्र दिखाई देता है, जिसे मुझे भेदना है।” गुरुदेव ने कहा, “तुम धन्य हो, तुम सफल हो जाओगे।” अर्जुन वास्तव में सफल हुआ। यही निर्देशन प्रत्येक छात्र के लिये श्रेयष्कर है। छात्र का लक्ष्य इस समय विद्याभ्यास है। राजनीति रूपी डायन के पल्ले पड्कर छात्र का जीवन इस प्रकार बर्बाद हो जाता जैसे कंटीली झाड़ियों के बीच में खड़े हुए केले के पत्ते जर्जर हो जाते हैं।
माना कि विद्यार्थी कल के नेता हैं, राजनीति के ज्ञान बिना वे क्या नेतृत्व करेंगे; परन्तु सोचिये कि महात्मा गाँधी ने बचपन में कौन-सी राजनीति सीखी थी ? तिलक, गोखले और चितरंजन को किसने राजनीति सिखाई थी, सच बात तो यह है कि जीवन का कार्य क्षेत्र स्वयं राजनीति सिखा देता है। विद्यार्थी की राजनीति तो विद्याभ्यास ही है और विद्यालय ही उसका वर्तमान कार्य क्षेत्र है। ये कोमल छात्र कुम्हड़बत्तियाँ (कोमल फल) हैं, इन्हें राजनीति की तर्जनी मत दिखाओ। ये पक्षी के छोटे बच्चे सभी पंखहीन हैं, ये अभी नीड (घोंसले) में ही रहने योग्य हैं। इन्हें राजनीति के उन्मुक्त आकाश में उड़ाने का प्रयत्न न करो। कोई हिंसक बाज इन्हें निगल जायेगा। राजनीति की दहकती हुई आग में, इधर मत आना, । यहाँ विश्व के रत्न सुरक्षित हैं। तेरा ताप पाते ही ये खण्डित हो जाएँगे।
यथार्थ में ही इस साधना के समय छात्र को ज्ञान के अथाह सागर में अवगाहन करने दो। राजनीति का बाल्टी भर पानी तो इन्हें फिर भी मिल जायेगा।
राजनीति सिखाने का अर्थ : विद्यार्थी को प्रारम्भ से ही राजनीति सिखाने का अर्थ है कि गाय के बछड़े को. जन्म लेते ही हल में जोड़ देना। अन्न के अंकुरों का ही आटा पीसने का मूर्खतामय प्रयत्न कौन करेगा ? राजनीति का कुछ सक्रिय ज्ञान महाविद्यालय के छात्रों के लिये अपेक्षित हो सकता है; परन्तु वह भी सीमित मात्रा में ही।
हाँ ! पंचतन्त्र और हितोपदेश आदि कहानी ग्रन्थों से राजनीति का कुछ ज्ञान करा सकते हैं। वह भी विष्णु शर्मा ने राजपुत्रों को राजनीति सिखाई थी, साधारण छात्रों को नहीं।
विद्यार्थी और राजनीति के बीच समस्या : विद्यार्थी और राजनीति की जब बात की जाती है, तो यह सबसे बड़ी समस्या होती है कि विद्यार्थी को राजनीति से कैसे दूर रखा जाए। हमारे देश में तो विद्यार्थी को राजनीति में फंसाया जाता है। विभिन्न राजनैतिक दलों में नेता अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने के लिये विद्यार्थियों के कंधे पर बन्दूक रखते हैं। कोई भी राजनैतिक पार्टी इस कलंक से अछूती नहीं है।
वस्तुत: विद्यार्थी को राजनीति का ज्ञान होना चाहिए और उसे सिद्धान्त रूप से वह सब कुछ जानना चाहिए जो राजकीय जीवन में हो सकता है। इसके लिये उसे राजनीतिशास्त्र का विद्यार्थी होना चाहिए; लेकिन यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि विद्यार्थी राजनीति में सक्रिय भाग न लें। इससे उनका मूल उद्देश्य शिक्षा प्राप्ति पूरा नहीं होगा।
उपसंहार : प्रत्येक बुद्धिमान् व्यक्ति ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि राजनीति में विद्यार्थी का योग नहीं होना चाहिये अर्थात् यदि निष्पक्ष दृष्टि से विचार किया जाए, तो राजनीति से विद्यार्थी दूर ही रहकर विद्याध्ययन कर सकता है। यहाँ तक एक बात यह कहनी उचित होगी कि जब से स्वतन्त्रता मिली है भारत का विद्यार्थी कुछ अधिक राजनीति में भाग लेने लगा है। वह अपने मूल कर्त्तव्य को भूल कर तोड़-फोड और हड़तालों में लग जाता है। विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ पूरी हों इस पर दो मत नहीं ; पर उनको पूरा करने का एक उचित रूप होना चाहिए। अन्त में निष्कर्ष रूप से यही कहा जा सकता है कि विद्यार्थी को सक्रिय राजनीति में नहीं आना चाहिये।