विज्ञान और स्वास्थ्य


प्रस्तावना : दृश्य-अदृश्य जीव-जगत में जो कुछ भी विद्यमान है। मनष्य उनमें सर्वोच्च स्थान एवं महत्व रखता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं आज तक विश्व में जिस किसी भी प्रकार का और जितना निर्माण हुआ है।  भविष्य में भी प्रभाव जो कुछ होते रहने की सम्भावना है। वह सब मानव के लिए ही है एवं होगा भीविश्व के सारे उपक्रम मानव को केन्द्र में रख कर ही किए गए किएजाते है। और किए जाएँगे मानव उन सभी का समुचित उपयोग एवं उपभोग तभी कर सकता है।  जब वह पूर्णतया स्वस्थ एवं जीवन्त रह सके इस बात को कभी एक क्षण के लिए भी ध्यान से ओझल नहीं किया जा सकता ओझल करना वास्तव में हानिकारक एवं दु:खद होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
स्वास्थ्य : रक्षा सर्वोच्च कर्त्तव्य-कार्य  कहावत है।  कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन-मस्तिष्क एवं आत्मा का निवास संभव हुआ करता है। इस प्रकार तन-मन-मस्तिष्क एवं आत्मिक स्तर पर स्वस्थ व्यक्ति ही अपने साथ-साथ दूसरों का भी ध्यान रखते हुए सभी प्रकार के अच्छे एवं महत्त्वपूर्ण कार्य, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में अनुसन्धान एवं आविष्कार के कार्य कर सकता है। किन्तु लेकिन जब उसके अपने निर्माण और आविष्कार ही उसके स्वास्थ्य एवं अस्तित्व को निगल जाने के लिए आतुर दिखाई देने लगे- यानि खरबूजे ही अपने को  उगाने वाले खेत को खाने लगे या खाने के लिए बेचैन हो उठे; तब भला रक्षा कभी सम्भव हो सकती है।  क्या ? हमारे विचार में तो तब रक्षा और बचाव का कोई भी उपाय कर पाना सम्भव नहीं रह जाया करता।
आज के तरह-तरह के मारक और संघातक शस्त्रास्त्रों के निर्माण और परीक्षणों ने मानव-जाति के स्वास्थ्य के साथ कुछ इसी प्रकार का, चूहे-बिल्ली वाला खेल खेलना आरम्भ कर दिया है। , इसमें तनिक भी सन्देह की गुंजाइश नहीं है। इन के निर्माता इस तथ्य को भूल गए है। कि इस सब का मानवता ; अपितु उनके अपने स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। , जबकि जीने और कुछ करने के लिए स्वास्थ्य रक्षा परमावश्यक है।  
यह तो हुआ एक पहलू ! ‘विज्ञान और स्वास्थ्य’ जैसे विषय पर एक अन्य पहलू से भी विचार किया जा सकता है। वह यह कि आज के मानव ने ज्ञान-विज्ञान की सहायता से मानव-जाति के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, तरह-तरह के घातक रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए कई प्रकार की प्राणरक्षक दवाइयों, यंत्रों और मशीनों का आविष्कार करके अपनी अद्भुत प्रतिभा एवं क्षमता का परिचय दिया है। उनकी सहायता से एक बार तो डॉक्टर रोगी को मौत के मुँह से भी खींच लाने में समर्थ हो जाया करता है। इस कटु सत्य को कतई नकारा नहीं जा सकता, फिर भी सोचने की बात और मुख्य प्रश्न यह है।  कि आज किस प्रकार के संघातक शस्त्रास्त्रों का निर्माण एवं परीक्षण हो रहा है।  उनके चलते क्या मानव का स्वास्थ्य एवं स्वयं मानव सुरक्षित रह सकता है।  ? 
विज्ञानजन्य प्रदूषण का प्रभाव : ऊपर जो प्रश्न उठाया गया है। आज की स्थितियों के चलते उसका स्पष्ट और एकमात्र उत्तर है। – नहीं रह सकता अनेक प्रकार के कल-कारखानों की चिमनियों से उठने वाले दमघोंटू धुएँ, उससे झड़ने वाले राख के कणों, मशीनों की घरघराहट, तरह-तरह की वैज्ञानिक गैसों की गन्ध से प्रदूषित वायु, जल, थल, तरह-तरह के आणविक शस्त्रास्त्रों के परीक्षणों से उठने वाला विषाक्त धुआँ जो सदियों तक के लिए आस-पास की मीलों दूर की वनस्पतियों तक को समाप्त कर देता है। , जिसने अन्तरिक्ष में धरती और उसके पर्यावरण की रक्षा करने वाली प्राकृतिक ओजोन-परत तक को जख्मी और घायल कर दिया है। , वह सब क्या मानव-स्वास्थ्य को कायम रहने देगा ? तरह-तरह से फैलकर निरन्तर फैल रहा प्रदूषण मानव को अस्वस्थ बना कर क्या उसका दम घोंट कर नहीं रख देगा? ठीक है आज के विज्ञान ने हमें अनेक प्रकार की प्राणरक्षक दवाइयाँ और यंत्र उपकरण दिए है। ; पर उनका प्रभाव भी तभी संभव रक्षा कर पाएगा कि जब शरीर को शुद्ध प्राणवायु प्राप्त हो सकेगीजब उन सभी के उपभोक्ता को स्वच्छ वायुमण्डल एवं साफ़-सुथरे वातावरण में रखा जाएगा; किन्तु तरह-तरह के वैज्ञानिक साधनों-उपकरणों, गैसों- धुओं ने कहाँ रहने दिया है।  वह सब ? जो थोड़ा-बहुत बच रहा है यही स्थिति बनी रहने पर उसे भी, तो बनाए-बचाए रख पाना सम्भव नहीं रह जाएगा सो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के नित नए बढ़ते चरणों, होने वाले नए-नए आविष्कारों को मानव-स्वास्थ्य के लिए घातक ही कहा जाएगा, रक्षक तो कदापि नहीं जल-वायु एवं आस-पास के समूचे पर्यावरण के शुद्ध रहने पर ही स्वास्थ्य-रक्षा संभव हो सकती है। आज तरह-तरह की शक्तिशाली प्राणरक्षक दवाइयाँ भी प्रभावी प्रमाणित नहीं हो रही है।, क्यों ? क्या यह चौंकाने और विचार करने को बाध्य कर देने वाली बात नहीं है।  ?
उपाय-उपचार : अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है।  कि मानव स्वास्थ्य को कौन-सा उपाय या उपचार करके इस प्रकार की विषम-मारक स्थितियों से बचाया जा सकता है।  ? हमारे विचार में प्रश्न के उत्तर के रूप में मात्र एक ही उपाय या उपचार सुझाया जा सकता है। वह यह कि सभी प्रकार के आणविक-जैविक तथा अन्य प्रकार के शस्त्रास्त्रों के परीक्षण-निर्माण आदि पूरी तरह से बन्द कर दिए जाने चाहिएदूसरे जितने प्रकार के भी कल-कारखाने आदि है।, उन्हें नगरों-बस्तियों से बहुत दूर प्रकृति के सघन वातावरण अर्थात् आस-पास के सघन वनस्पतियों से घिरे स्थानों पर बनाया जाना चाहिए : ताकि इन से सभी प्रकार के प्रदूषण का तत्काल प्राकृतिक उपचार होता जाएइसी  प्रकार डीजल-पैट्रोल आदि से चलने वाले तरह-तरह के वाहनों का भी मानव-बस्तियों में प्रवेश नियंत्रित होना चाहिएइस प्रकार के उपाय-उपचार ही मानव-स्वास्थ्य एवं भविष्य को सुरक्षित रख सकते है।
उपसंहार : यह तो निश्चित है।  कि निरन्तर प्रगति करता हुआ आज का वैज्ञानिक-जगत पीछे तो नहीं मुड़ सकता ; पर कम-से-कम आगा-पीछा देख कर अपने-आप को स्वयं अपने लिए नियंत्रित तो कर ही सकता है। जो हर प्रकार से व्यर्थ प्रमाणित हो चुका या घातक प्रमाणित हो रहा है।  उससे पीछा भी निश्चय ही छुड़ा सकता है। मानवता का स्वास्थ्य और भविष्य सुरक्षित रखने के लिए ऐसा करनाअपरिहार्यता और बुद्धिमानी दोनों है।