पुस्तकालय से लाभ

एस्तावना : श्रेष्ठ तथा बुद्धिमान् पुरुषों का समय काव्य-शास्त्र के विनोद में व्यतीत होता है। काव्य के अध्ययन से यश, अर्थ, व्यावहारिक ज्ञान और कल्याण की प्राप्ति होती है।
जिस प्रकार भोजन से हमारा शरीर जीवित रहता है उसी प्रकार मानसिक जीवन के लिए अध्ययन परमावश्यक है। अध्ययन मन की खुराक है। मानव-जीवन में अध्ययन का बहुत बड़ा महत्त्व है। चरित्र-निर्माण और जीवन को श्रेष्ठतम बनाने का व्यावहारिक ज्ञान हमको अध्ययन के द्वारा ही प्राप्त होता है इसीलिए लोगों ने ज्ञान की श्रेष्ठता के कारण कहा है कि पढ़े-लिखे लोगों के चार आँखें होती हैं और जो लोग ज्ञान युक्त हैं वे ‘जीवन कला’ जानते हैं जो इस साहित्य ज्ञान से अनभिज्ञ हैं। ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ की उक्ति को चरितार्थ करते हैं वे नर तो वास्तव में बिना सींग-पूँछ के हैं।
पुस्तकालय क्या है ? : ‘पुस्तकालय’ शब्द का निर्माण पुस्तक+आलय से मिलकर हुआ है, जिसका अर्थ है पुस्तकों का घर; किन्तु केवल पुस्तकों को एक स्थान पर इकट्ठा रख देने से या किसी कमरे में भर देने से पुस्तकालय नहीं हो जाता। वास्तव में पुस्तकालय, पुस्तकों का ऐसा संग्रहालय है, जिसके उपयोग आदि का एक सुनिश्चित विधान होता है तथा इसका सामाजिक उपयोग सभी व्यक्ति बिना किसी भेद-भाव के कर सकते हैं। यह एक संस्था है जिसका लक्ष्य बहुजन हित है।  
विदेशों में पुस्तकालय : अमेरिका, इंग्लैंड और रूस पुस्तकालयों की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं। अमेरिका के वाशिंगटन का कांग्रेस पुस्तकालय विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। वहाँ पर चार करोड़ से भी अधिक पुस्तकें हैं तथा इसमें 25000 व्यक्ति कार्य करते हैं। इंग्लैंड के ब्रिटिश म्यूजियम में पुस्तकों की संख्या पचास लाख है। रूस का सबसे बड़ा पुस्तकालय मास्को स्थित ‘लेनिन पुस्तकालय’ है। इसमें डेढ़ करोड़ पुस्तकें तथा 2 करोड़ 5 लाख पृष्ठों की पाण्डुलिपियाँ हैं। ये सभी पुस्तकें 160 भाषाओं की हैं। यहाँ पर लगभग चार हजार व्यक्ति प्रतिदिन पढ़ने आते हैं। इसमें अलमारियों की संख्या 116 मील लम्बा स्थान घेरे है। रूस का दूसरा विशाल पुस्तकालय ‘साल्तिकोफश्चेडिन’ सार्वजनिक पुस्तकालय है।
भारत में पुस्तकालयों की कमी : अत्यन्त दु:ख की बात है कि हमारे भारतवर्ष में पुस्तकालयों की पर्याप्त कमी है। नगरों में कहीं अल्प मात्रा में पुस्तकालय हैं, देहातों में नहीं के बराबर ही पुस्तकालय हैं। अन्य देशों में गाँव-गाँव में पुस्तकालय हैं। भारत में राष्ट्रीय पुस्तकालय कलकत्ते में है जहाँ पर दस लाख पुस्तकें हैं। अमेरिका और इंगलैंड और रूस के सामने इस क्षेत्र में भारत बहुत पिछड़ा है। पुस्तकालयों के अभाव में ही भारत ज्ञान तथा पढाई के क्षेत्र में पर्याप्त पिछड़ा हुआ है। पुस्तकालय कैसे हों ? आज भारत में एक ऐसे पुस्तकालय की नितान्त आवश्यकता प्रतीत हो रही है जहाँ भारत में छपा हुआ प्रत्येक ग्रन्थ हो। तथा विश्व में छिपे हुए भी प्रायः सभी भाषाओं के सभी ग्रन्थ हों। पुस्तकालय में सभी पुस्तकों को विषय के अनुसार विभाजित कर देना चाहिए। पुस्तकालय का बड़ा आकार होने पर विषय के अनुसार पृथक्-पृथक् छोटे-छोटे अनेक पुस्तकालयों में विभाजित कर देना चाहिए। प्रायः विश्वविद्यालयों में प्रत्येक विभाग का अपना ही पुस्तकालय होना चाहिए जिससे छात्रों को अधिक सुविधा प्राप्त हो सके। चल पुस्तकालयों द्वारा ग्रामीण जनता को शिक्षित किया जाए।
पुस्तकालयों से लाभ : पुस्तकालय बड़ी उपयोगी संस्था है। इससे असंख्य लाभ हैं। पुस्तकों के द्वारा हम किसी महापुरुष को जितना जान सकते हैं, उतना उसके मित्र क्या पुत्र तक भी उसे नहीं जान सकते। पुस्तकों द्वारा हमें धर्म, दर्शन, इतिहास, विज्ञान, व्याकरण, निबन्ध, भूगोल, कविता और कहानी आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। घर बैठे। हमें पुस्तकों के माध्यम से बुद्ध, ईसामसीह, शंकराचार्य, लेनिन, चाणक्य, मार्क्स, गाँधी, कालिदास, शेक्सपियर, सुकरात, अरस्तू, सूर, तुलसी, मीरा और अज्ञेय आदि का परिचय प्राप्त होता है।
पुस्तकालयों में हम महापुरुषों राम और कृष्ण आदि के सुन्दर चरित्रों का अवलोकन करते हैं। सत्यवादी हरिश्चन्द्र की कहानी पढ़कर हम सत्य वक्ता बनकर अपनी आत्मा को संयम से शुद्ध करते हैं।
पुस्तकालय की रक्षा : पुस्तकालय सामाजिक महत्त्व की चीज है। अतः यहाँ की पुस्तकों को बर्बाद नहीं करना चाहिये अपितु अलभ्य पाण्डुलिपियाँ अपने पास से सार्वजनिक हितार्थ इन पुस्तकालयों में देनी चाहिए।
पुस्तकालय के नियम : पुस्तकालय के सर्वसाधारण नियम हैं कि वहाँ पूर्ण शान्ति के साथ पुस्तक पढ़कर यथास्थान यथाक्रम से रख देना चाहिये, कोई पृष्ठ पुस्तक से पृथक् नहीं करना चाहिए।
उपसंहार : वर्तमान काल में भारत में पुस्तकालयों की विशेष कमी है। छोटे-छोटे पुस्तकालयों में सभी विषयों की पुस्तकों का अभाव है। सरकार को चाहिये कि वह मानव ज्ञान की आधारशिला इन पुस्तकालयों पर अधिक धन व्यय करे, जिससे राष्ट्र निर्माण हो सके।