राष्ट्रभाषा

प्रस्तावना : मानव मनोवृत्तियों के विकास का साधन शिक्षा ही है। मानव की जन्मजात विशेषताएँ शिक्षा द्वारा अकुरित, पल्लवित और पुष्पित होती हैं।
शिक्षा का माध्यम : शिक्षा उसी माध्यम से दी जानी चाहिए, जिसे बालक-बालिकाएँ आसानी से समझ सकें । दूसरे शब्दों में शिक्षा का सबसे उत्तम माध्यम बालक की अपनी मातृभाषा ही हो सकती है। यदि उसे किसी अन्य भाषा से शिक्षा दी जाए, तो सबसे पहले वह भी सिखानी होगी । इसके लिए बहुत समय चाहिए। जितना समय उस भाषा को सीखने में लगाया जायेगा, उतने समय में बालक को कितनी ही शिक्षा दी जा सकती है।
शिक्षा का माध्यम वही भाषा होनी चाहिए (1) जो कठिन न हो, (2) उसके व्याकरण के नियम जटिल न हों, (3) उसकी वर्णमाला सुगम और सरल हो, (4) उस भाषा में पुस्तकें विद्यमान हों।’
प्रत्येक बालक के लिए उसकी मातृभाषा ही सबसे सरल होती है, उसकी वर्णमाला वह जल्दी सीख जाता है, उसकी बोली वह जल्दी सीखता है; क्योंकि घर में भी वह उसी को बोलता और सुनता है। रही पुस्तकों की बात यदि पुस्तकें उस भाषा में उपलब्ध न हों, तो तैयार की जा सकती हैं। यह तो हुई प्राथमिक शिक्षा की बात।
माध्यमिक तथा उच्चतर माध्यमिक शिक्षा भी बालक को उसकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। यह तभी संभव है, जब उस भाषा में विविध विषयों का साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। यह अवश्य है कि उस भाषा में कविता, कहानी, विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीति, इतिहास और अर्थशास्त्र आदि की पर्याप्त मौलक तथा अनूदित पुस्तकें विद्यमान हों।
राष्ट्रभाषा का अध्ययन – माध्यमिक तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर पर नाना विषयों के अतिरिक्त बालक को अपनी राष्ट्रीय भाषा का भी अध्ययन अवश्य कराया जाना चाहिए । बालक की गति केवल अपने प्रदेश तक ही सीमित न रहे; बल्कि वह समस्त देश का एक योग्य नागरिक भी बन सके, इसके लिए राष्ट्रभाषा का अध्ययन करना अनिवार्य होना। चाहिए ।
उच्च शिक्षा का माध्यम : इसके बाद महाविद्यालय की शिक्षा का नम्बर आता है। कॉलेज की शिक्षा केवल राष्ट्रभाषा में दी जानी चाहिए। इसके लिए कॉलेज स्तर की मौलिक तथा अनूदित, विविध विषयों की पुस्तकें प्रकाशित की जानी चाहिए। विदेशी भाषा में कॉलेज की शिक्षा देना मानसिक गुलामी की निशानी है। प्रादेशिक भाषा अथवा विद्यार्थी की अपनी मातृभाषा में कॉलेज शिक्षा देना संकीर्णता का परिचायक है। समस्त देश का सम्पूर्ण राजकाज और शासन सम्बन्धी सभी कार्य राष्ट्रभाषा में किया जाना चाहिए। भारत में यदि यह काम प्रान्तीय भाषाओं में किया जाएगा, तो देश की एकता कहाँ रहेगी ? सभी प्रदेशों के कार्यों में एकरूपता कैसे आयेगी ? एक प्रदेश के पढे लोग दूसरे प्रदेशों में या केन्द्र में कैसे काम करेंगे ? और यदि संसद की कार्यवाही प्रान्तीय भाषाओं में होगी तो जंगल का सा दृश्य नजर आएगा। सभी देशों की अपनी एक मुख्य राष्ट्रभाषा होती है। भारत के संविधान में वह दर्जा हिन्दी को दिया गया है। हमारे विचार में कॉलेज की शिक्षा हिन्दी भाषा में ही दी जानी चाहिए। विदेशों में व्यवहार के लिए कॉलेज की पढ़ाई में किसी विदेशी भाषा का समावेश अवश्य किया जाना चाहिए।