जीवन में खेलों का महत्त्व


प्रस्तावना : जीवन में स्वास्थ्य का ही सबसे अधिक महत्व है। शक्तिशाली मानव ही भूमण्डल पर हर प्रकार का सुख भोग सकता है। इसके लिए दुष्कर कृत्य भी सुगम हो जाते है।उससे शत्रु भी सदैव भयभीत रहता है। और उपलब्धियाँ उसके पगों में लोटती है। कार्य सिद्धि सहचरी के समान उसके पीछे चलती है। उसमें अदम्य साहस, उत्साह और धैर्य आ जाता है। आत्म-विश्वास के कारण उसका हृदय सदैव प्रफुल्लित रहा है।  और निडरता उसमें कूट-कूटकर भरी रहती है। अत: पूर्वजों का उद्देश्य था- शक्ति की अर्चना जिसके पास स्वास्थ्य रूपी निधि नहीं वह कुबेर होते हुए भी जीवन को भार समझ कर काटता है। ऐसी अवस्था में घर में बने हुये षट्रस व्यंजन भी उसके लिए विष समान हो जाते है।इच्छा होते हुए  भी वह उनका उपभोग नहीं कर सकता है। अल्पकाल में ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है। उसके जीवन से आनन्द रूपी खिलौना कोसों दूर चला जाता है। जिसे पाने में वह अपने को असमर्थ समझता है। अत: कहा गया है। कि ‘पहला सुख निरोगी काया’ वास्तव में स्वस्थ देह ही ईश्वरीय देन है। स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ, सुन्दर वस्त्रालंकार और सांसारिक ऐश्वर्य स्वस्थ मानव के लिए भोग्य तथा अस्वस्थ मानव के लिए भार होते है। महाकवि कालिदास ने भी कहा है।  कि देह रक्षा हीधर्म का पहला साधन है।
विभिन्न प्रकार के व्यायाम व खेल : व्यायाम के अनेक प्रकार है और खेल भी अनेक प्रकार के होते है।हमारे देश में व्यायाम की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। जैसे दण्ड-बैठक लगाना, कुश्ती लड़ना, भ्रमण, घुड़सवारी, तैराकी और मुग्दर घुमाना आदिइनके अतिरिक्त विविध प्रकार के आसन, लेजिम, लाठी और जिमनास्टिक आदि भी इसके अन्तर्गत आते है।खेलों के अन्तर्गत फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल, क्रिकेट, कबड्डी, लम्बी कूद, ऊंची कूद और हर प्रकार की दौड़ आदि आते है।इनके द्वारा शारीरिक शक्ति एवं मनोरंजन होता है। वास्तव में देखा जाये, तो खेल और व्यायाम दोनों ही शक्ति के स्रोत है।जो इस स्रोत के अनुयायी रहते है।, वे सदैव शक्तिशाली, चुस्त और निरोगी रहते है।शिथिलता एवं आलस्य उनसे कोसों दूर रहता है। देह में रक्त की गति तीव्र रहती है।  जिससे पाचन शक्ति ठीक रहती है। सारी देह सुडौल, सुसंगठित एवं सुदृढ़ हो जाती है। पुढे शक्तिशाली हो जाते है।नेत्रों की ज्योति बढ़ जाती है। और मुखारबिन्द अद्भुत क्रांति से दमक उठता है।  तथा हृदय उत्साह, आत्म-विश्वास और निडरता से युक्त रहता है। मन उल्लासपूर्ण रहता है। रोग रूपी दैत्य उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। ; क्योंकि उसकी देह बज्र बन जाती है।
व्यायाम और खेल का मानव चरित्र पर प्रभाव : किसी ने सच ही कहा है  कि स्वस्थ देह में मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक रहता है  और बौद्धिक विकास में प्रगति होती है। इसके अतिरिक्त व्यायाम और खेल का मानव के चरित्र पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। व्यायाम दारा मन की कुत्सित भावनाएँ दूर हो जाती है। और इन्द्रियों में संयम आ जाता है। संयम चरित्र का आभूषण है। इसके अंगीकार कर्ता में धैर्य, सहनशील और क्षमा आदि गुण भी स्वयं ही प्रकट हो जाते है। छल, कपट और झूठ से घृणी हो जाती है। यही कारण है।  कि व्यायामप्रिय और खिलाड़ी सच्चरित्र एवं न्यायप्रिय, देखे जाते है।।
हमारे देश के व्यायामशील पुरुष : हमारा देश व्यायामशील पुरुषों का भण्डार रहा है। यहाँ के वीरों की यश पताका एवं गाथाएँ सारे ब्रह्माण्ड में फहराई एवं गायी गई है।पृथ्वीराज चौहान के शब्द-भेदी बाण, प्रताप और शिवा का शत्रुदमन किससे गोपनीय है।  ? मुगल सम्राट अकबर की घुड़सवारी और स्वामी रामतीर्थ की तैराकी और व्यायाम की प्रवृत्ति से कौन परिचित नहीं ? आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती में शक्ति और स्वास्थ्य का चरमोत्कर्ष हुआ थाराष्ट्रपिता गाँधी जी को भ्रमण की आदत थीजवाहरलाल नेहरू जी को तैरने में अत्यन्त रुचि थोगामा पहलवान ने मल्लयुद्ध में ख्याति प्राप्त की थीराममूर्ति ने इसी शक्ति के बल पर हाथी को अपनी छाती पर उठा कर विश्व में भारत के नाम को उज्ज्वल किया था।
व्यायाम और खेल के नियम : व्यायाम और खेल के कुछ नियम होते है।इन नियमों की उपेक्षा लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाती है। भोजन के पश्चात् व्यायाम करना अथवा खेलना बहुत ही हानिकारक है। ; परन्तु व्यायाम अथवा खेल के उपरांत थोड़ा-बहुत जलपान आवश्यक है। व्यायाम शक्ति के अनुसार ही करना चाहिएइसके आधिक्य से शक्ति क्षीण हो जाती है। इसके लिए स्थान स्वच्छ,  खुला और हवादार होना चाहिएव्यायाम एवं खेल की स्थिति में मुख को बन्द रखना चाहिएतेल मलकर स्नान करना, सादा एवं सात्त्विक भोजन, दूध, शाक तथा फलों का आहार स्वास्थ्य के अमोघ शस्त्र है।स्वच्छ जल और स्वच्छ वस्त्र शारीरिक उन्नति में सहायक है।उच्च विचार शरीर के पोषक है।
उपसंहार : मनुष्य को दीर्घावस्था के लिए व्यायाम एवं खेल का अनुसरण करना नितांत आवश्यक है। पाश्चात्य देशों ने इस दिशा में आशातीत. प्रगति की है। 40 वर्ष की अवस्था में वहाँ के पुरुष युवावस्था में पदार्पण करते है। और इस अवस्था में भारतवासी वृद्धों मेंगिने जाते है।शिक्षार्थियों को चाहिए कि वे समय निकालकर व्यायाम किया करें या किसी न किसी प्रकार के खेलों में भाग लिया करेंइससे उनका स्वास्थ्य बना रहेगा और वे देश का कल्याण कर सकेंगे।