दशहरा एवं विजयदशमी

प्रस्तावना : हमारे देश भारत में धर्म की प्रधानता है। इसी कारण यहाँ की हर बात किसी न किसी रूप में धार्मिक भावनाओं से लिप्त रहती है। इन्हीं से उद्गम हुआ है पर्व और त्योहार का। ये जन-जन के हृदय में नवस्फूर्ति और नई चेतना प्रदान करते हैं। अत: इनके मनाने की प्रथा चिर पुरातन है। कहने का तात्पर्य यह है। कि वर्ष का हर दिन भारत में एक पर्व या त्योहार है, जिसे कोई न कोई जाति अपनी प्रथानुसार मनाती रहती है। हिन्दू जाति के भी असंख्य त्योहार हैं; किन्तु उनमें रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावाली और होली मुख्य त्योहार हैं। इन्हें सभी वर्ण एवं हिन्दू जाति से सम्बन्धित लोग आनन्द और उत्साह के साथ मनाते हैं। इनमें दशहरा विशेष रूप से क्षत्रिय जाति का त्योहार है।
त्योहार मनाने का समय तथा तरीके: दशहरा हर वर्ष आश्विन शुक्ला दशमी को मनाया जाता है। पुरातन काल में पावस ऋतु में प्रायः भारतवासी पर्यटन के कार्यक्रम को स्थगित कर घर पर ही रहा करते थे। मुनि लोग भी पर्यटन त्यागकर एक ही स्थान पर ‘चतुर्मास’ व्यतीत किया करते थे। क्षत्रिय लोग समरांगण से लौटकर अपने देश में विश्राम किया करते थे और उनका समय शारीरिक गठन तथा खेल-कूद में व्यतीत हुआ करता था। इस त्योहार के आगमन पर अस्त्र-शस्त्रों को तैयार कर युद्ध योजनाओं के निर्माण में लग जाते थे। अत: दशहरा विशेष रूप से क्षत्रियों का त्योहार कहलाता है। ऐसा भी प्रचलित है कि इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने लंका नरेश रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त की थी ।
रजवाड़ों में दशहरा बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। शस्त्रागारों की सफाई करायी जाती है। शस्त्रों को चमकाकर उनका पूजन किया जाता है। सुसज्जित सेना का प्रदर्शन किया जाता है। संध्या-वेला में लक्ष्य वेध प्रतियोगिता और अश्व दौड़ प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है। दोपहर के समय कहीं-कहीं पर अश्व पूजन किया जाता है।
उत्तर भारत में रामचरितमानस पर आधारित रामलीला का प्रदर्शन किया जाता है। दशहरा के दिन इस लीला में रावण का वध दिखाया जाता है। रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के कागज़ के पुतले बनाकर उनमें हर प्रकार की आतिशबाजी रख दी जाती है। रामलीला की समाप्ति पर इनमें अग्नि प्रज्वलित कर दी जाती है। रंग-बिरंगी चिनगारियाँ उनमें से निकलने लगती हैं और जोर-जोर के धमाके होने लगते हैं। इस प्रकार के वीरोचित प्रदर्शन से जन-जन के हृदय में वीर भाव भर जाते हैं।
बंगाल प्रान्त में इस शुभावसर पर महामहिमा दुर्गा का पूजन किया जाता है। बंगाली इस पूजन को बड़ा ही शुभ मानते हैं। अष्टमी के दिन दुर्गा की पूजा विशेष रूप से की जाती है। नवमी को दुर्गा के समक्ष भैंसे और बकरों की बलि चढ़ायी जाती है। कदाचित् यह प्रथा दुर्गा जी के महिषासुर-वध की यादगार है; किन्तु यह हिंसात्मक प्रथा उचित नहीं। इस प्रथा का अन्त होना ही चाहिए । पुरातन युग में तो अवश्य ही क्षत्रियों की युद्ध तैयारियों के कारण इसका विशेष महत्त्व । था; किन्तु आज के वैज्ञानिक युग में पावस-ऋतु में भी आवागमन में । किसी प्रकार का विघ्न नहीं पड़ता है।
उपयोगिता : इस त्योहार की उपयोगिता कई कारणों से है। रामलीला के प्रदर्शन में बालकों के हृदय में पित्राज्ञापालन, गुरु-भक्ति, भ्रातृ-भावना और शौर्य का संचार हो जाता है। रावणादि के अनाचारों को देखकर असंख्य लोगों के हृदय में दुराचार के प्रति ग्लानि उत्पन्न हो जाती है। इससे धार्मिक विशेषताएँ और पारस्परिक वैमनस्य भी किसी सीमा तक दूर हो जाता है। इन दिनों बड़े-बड़े नगरों में रामलीला की सवारी निकाली जाती है। इससे पूर्वजों के चरित्र, नेत्रों के सम्मुख आ जाते हैं, जिसके स्मरण से जन-साधारण में भी शौर्य की भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। और हर्षोल्लास तथा प्रेम-सम्मिलन में यह त्योहार बीत जाता है।
इस शुभ त्योहार पर उत्तर भारत की हिन्दू ललनाएँ घरों की सवेरे से ही अच्छी प्रकार से सफाई करती हैं। बच्चों से लेकर बूढे तक सभी स्नान कर नये-नये वस्त्रों को धारण करते हैं। फिर दशहरे का पूजन किया जाता है तत्पश्चात् बहनें अपने भाइयों के कानों में ‘नौरते’ टाँगती हैं। मिष्ठान्न खाया जाता है। संध्या समय सब लोग रामलीला देखने जाते हैं।
उपसंहार : दशहरा हमारी भारतीय परम्परा, गौरव और संस्कृति का प्रत्यक्षीकरण करता है। यह राष्ट्र के उत्थान में बहुत ही अधिक सहायक है। अनुमानत: हर जाति अपने जातीय पर्वो से ही जीवन में आशा एवं स्फूर्ति का संचार करती है। आमोद-प्रमोद अथवा मनोरंजन की दृष्टि से भी ये पर्व महत्त्वहीन नहीं हैं। इसी कारण हर मानव को अपने पर्वो पर पूरा-पूरा गर्व है। वह जाति-कल्याण के इस उत्तम साधन को बड़ी धूमधाम से मनाता है।