छात्रावास का जीवन


छात्रावास का महत्त्व : छात्रावास शिक्षालय का प्रमुख अंग है। शिक्षालय में प्रवेश लेकर छात्र जो कुछ सीखता है। छात्रावास में रहकर उसकी पुष्टि की  जाती है। पुरातन युग में वे छात्रावास में रहकर गुरु का सानिध्य ग्रहण कर ज्ञानार्जन किया करते थे। वहाँ का वातावरण चरित्र निर्माण में सहायक होता था। बहुधा देखने में आता है कि घर पर रहने वाले शिक्षार्थी की अपेक्षा छात्रावास में रहने वाला शिक्षार्थी कहीं अधिक सभ्य, अध्ययनशील और मिलनसार होता है। नित्य घर में जाने वाला शिक्षार्थी शिक्षालय में कुछ देर दर्शन देकर चला जाता है, जबकि छात्रावास में रहने वाला शिक्षार्थी विद्यालय का आवश्यक अंग होता है। इसके हृदय में शिक्षालय के प्रति आत्मीयता रहती है। उसका हृदय शिक्षालय के गर्व से उन्नत रहता है। ये बातें घर पर रहने वाले शिक्षार्थी के हृदय में नहीं उपजती हैं।
छात्रावास का वातावरण : घर और छात्रावास में सबसे बड़ा अन्तर है वातावरण का। घर पर अध्ययन के लिये अनुकूल वातावरण नहीं होता है। घर पर पारस्परिक क्लेश, आपसी मनमुटाव, स्थानाभाव और कामकाज के बन्धन इतने अधिक होते हैं कि शिक्षार्थी उन सबसे स्वयं को पृथक् नहीं रख पाता है। छात्रावास का वातावरण इन सब से दूर शान्त, स्वच्छ एव स्निग्ध होता है। अध्ययन के लिये अवकाश ही अवकाश रहता है। शयन, व्यायाम और आहार का नियमित समय होता है। समाचारपत्र, पुस्तकालय, वाद-विवाद, व्याख्यानादि और सहयोगी अध्ययन के कारण बौद्धिक विकास के लिये सुनहरा मौका मिलता है। छात्रावास की स्वतन्त्रता स्वावलम्बी बनने की प्रथम सोपान होती है। घर पर लगभग इन सबका अभाव ही रहता है। अत: ज्ञानार्जन की दृष्टि से घर छात्रावास की छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकता है।
छात्रावास के गुण : इनके अतिरिक्त छात्रावास के और भी बहुत से गुण हैं। यहाँ का स्वच्छ वातावरण और शुद्ध जलवायु शरीर को स्वस्थ और नीरोग रखता है। नियमित रूप से खेल-कूदों में भाग लेने के कारण शरीर ही स्वस्थ नहीं रहता ; अपितु मन भी सारे दिन प्रफुल्लित रहता है। विद्याध्ययन के लिये लालसा बढ़ी है। संयम और नियमादि का पालन करना पड़ता है। अत: छात्रावास का रहना स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।
छात्रावास में ही विद्यार्थियों का चतुर्मुख विकास : शिक्षार्थी के बौद्धिक एवं मानसिक विकास के लिये छात्रावास सर्वश्रेष्ठ स्थान है। यहाँ पर अच्छे-अच्छे समाचारपत्रों का भण्डार रहता है, पुस्तकों का सागर लहराता रहता है और इनमें गोते लगाने वाले शिक्षार्थी मनोरंजन द्वारा ज्ञानार्जन करते हैं। कभी अपनी हस्तलिखित पत्रिका सम्पादित करते है। कभी वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करते है। कभी वीर रस की कविताओं का रसास्वादन करने के लिये कवि-गोष्ठी का आयोजन करते है। कभी एकांकी द्वारा आदर्श का रूप प्रस्तुत करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त आपसी संसर्ग के कारण स्पर्धा पनपती है, जिससे विद्याध्ययन में लाभ ही लाभ पहुँता है। साधारण से साधारण छात्र मेधावी बन जाता है।
चरित्र जैसे सर्वश्रेष्ठ धन की सुरक्षा के लिये भी छात्रावास उपयुक्त स्थान है। यहाँ पर रहने वाले हरेक शिक्षार्थी को छात्रावास के नियमों के पालन के साथ-साथ अनुशासनप्रिय भी बनना पड़ता है। आत्म-निर्भरता की भावना जाग्रत होती है। सेवा भाव की इच्छा सदैव बलवती रहती है। इस प्रकार अनुशासन, स्वावलम्बन और आत्मविश्वास से चरित्र पुष्ट हो जाता है।
छात्रावास ही वह स्थान है जहाँ पर हर अवस्था के शिक्षार्थियों का संगम होता है। सभ्यता और संस्कृति का परिचय होता है। आपसी प्यार बढ़ता है जिससे उचित व्यवहार करने की आदत पड़ती है। धीरे-धीरे सामाजिक भावनाओं का विकास होता है। एक-दूसरे का सुख-दु:ख बन जाता है। इससे पारिवारिक भावना का जन्म होता है। एकाकी भावना दूर हो जाती है। बुरी आदतें छूट जाती हैं। आलस्य इनके पास फटकता नहीं। चिन्ता दूर भागती है। स्वतन्त्रता सहचरी बनी रहती है। इस प्रकार विघ्नों से दूर रहकर शिक्षार्थी अपने लक्ष्य को पूरा कर लेता है।
उपसंहार : आधुनिक छात्रावास में कुछ-कुछ त्रुटियाँ आने लगी। हैं, जिनसे सुधार के स्थान पर शिक्षार्थियों का अहित होने लगा है।। ये फैशन, राग-रंग और दुराचार के अड्डे बन गये है। इनमें रह कर शिक्षार्थी अमूल्य जीवन को दुर्व्यसन के गर्त में धकेल देता है। फैशनपरस्ती में माँ-बाप की पसीने की गाढ़ी कमाई को बर्बाद कर देता है। इसका कारण है छात्रावास के प्रबन्धक की उपेक्षा । शिक्षालय के पदाधिकारियों का कर्तव्य है कि वे अपने उत्तरदायित्व को समझे, शिक्षार्थियों को फैशन तथा दुर्व्यसन के संक्रामक रोगों से बचाएँ तभी छात्रावास शिक्षार्थियों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकेंगे ।