हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव

प्रस्तावना : मानव के पुर्ण विकास के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। केवल किताबी अध्ययन से छात्र का मन ऊबने लगता है। ऐसे अवसर पर वह विश्राम चाहता है। मानव के इस मनोविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए प्रायः सभी संस्थाएँ एकरस कार्य की नीरसता को दूर करने के लिए विविध उत्सवों का आयोजन करती हैं।
विद्यालय जीवन में वार्षिकोत्सव का विशेष महत्त्व है। यह उत्सव अन्य संस्थाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होता है; क्योंकि इन उत्सवों का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही नहीं होता है। विद्यार्थियों के आत्म-संयम तथा विद्यालय की प्रगति में सहयोग देना एवम् अभिभावकों से संपर्क स्थापित करना भी इनका लक्ष्य होता है। इन उत्सवों के आयोजन से विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन, आत्माभिव्यक्ति तथा उत्तरदायित्व की भावना को बहिर्मुखी होकर विकसित होने का पूर्ण अवसर प्राप्त होता है।
वार्षिकोत्सव की तैयारी : हमारे विद्यालय में प्रति वर्ष वार्षिकोत्सव का प्रारम्भ वसन्तपंचमी से एक सप्ताह पूर्व हो जाता है। इस वर्ष हमारे विद्यालय को प्रारम्भ हुए पच्चीस वर्ष पूर्ण हो गए थे। अत: हमारे विद्यालय की कार्यकारिणी समिति ने इस वर्ष इस उत्सव को विशाल रूप से मनाने का विचार किया। समिति के एक सदस्य के रूप में होने के कारण हमने तथा प्रधानाचार्य जी ने विशेष बल देते हुए इस हेतु कुछ रूपरेखाएँ तथा सुझाव प्रस्तुत किए। वे सुझाव वरिष्ठ सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से मान लिये गये । तदनुसार इस वर्ष के वार्षिकोत्सव को विशाल रजत जयन्ती समारोह के रूप में मनाने के लिये प्रार्थना स्थल पर 1-1-2000 से 10-2-2000 तक तिथियाँ घोषित की गईं। इस घोषणा का छात्र-छात्राओं ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। प्रत्येक छात्र इन तिथियों की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगा और कार्यक्रमों में भाग लेने की तैयारी करने लगा। इस कार्यक्रम को विशेष रूप से सफल बनाने के लिये प्रधानाचार्य एवं मन्त्री महोदय जी ने पृथक्-पृथक् अध्यापकों में कार्य-विभाजन कर अलग-अलग विभागाध्यक्ष व सहायक नियुक्त कर दिये। मुझ पर भी वाद-विवाद प्रतियोगिता, अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा कवि सम्मेलन का प्रधान रूप से कार्य भार सौंपा गया। विद्यालय का समस्त शिक्षक वर्ग, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी, कार्यकारिणी के सदस्यगणों तथा छात्र-छात्राओं ने इस उत्सव हेतु जमकर तैयारी की।
सम्पूर्ण विद्यालय भवन को चूने से पुतवाया गया। यथास्थान पुष्पों बेलबूटों, कुर्सी-मेजों, खिड्की एवं दरवाजों की रंगाई की गई। गमलों, चित्रों एवं ध्वजाओं आदि के द्वारा सम्पूर्ण विद्यालय को खूब सजाया गया। नगर के समस्त विद्यालयों के छात्रों एवं नगर अध्यक्षों को विभिन्न आयोजनों में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया गया। शिक्षा-निर्देशक शिक्षामन्त्री, मुख्यमन्त्री, उपमन्त्री, श्रम विभाग, मंत्री तथा उपराज्यपाल आदि वरिष्ठ अधिकारियों को आमंत्रण-पत्र प्रेषित किये गये।
कार्यक्रमों का प्रारम्भ : विशेष कार्यक्रमों के निश्चित दिन अभी कुछ दूर थे कि विद्यालय में विविध प्रकार के मैच प्रारम्भ हो गए । अलग-अलग क्रीड़ाओं में विविध प्रकार के खेल खेले जा रहे थे। कहीं रस्साकसी पर जोर आजमाया जा रहा था तो कहीं कबड्डी और ऊँची व लम्बी छलाँग लगाई जा रही थी । कहीं फुटबॉल मैच हो रहा था तो कहीं क्रिकेट की प्रतियोगिता आयोजित थी। इसी प्रकार भारोत्तोलन, मुक्केबाजी और दौड़ आदि की कलाएँ भी दिखाई जा रही थी।
इस प्रकार विविध आमोद-प्रमोद तथा मनोरंजनपूर्ण कार्यक्रमों के साथ दिन व्यतीत होते गये तथा मुख्य समारोह का समय भी सम्मुख आ गया। प्रथम दिवस प्रात: काल सात बजे वेद-मन्त्रों के उच्चारण से संयुक्त यज्ञ का विधान कर विद्यालय प्रांगण को पवित्र किया गया। मध्याह्नोपरान्त क्रीड़ा-क्षेत्र को सजाया गया। प्रांगण के चारों ओर बाँस-बल्लियाँ घेरकर सुरक्षित किया गया। इस प्रांगण के चारों ओर दर्शकगणों के देखने के लिय पहले से सीमेंटिड सीटें बनी थीं, उनको साफ़ कराया गया। एक ओर मध्य में ऊँचे से चबूतरे पर सामियाना लगाकर उसके नीचे सोफासेट लगाए नए, उनके सम्मुख मेजों को गुलदस्ता आदि से सजाया गया। यह मुख्य अतिथि के बैठने का स्थान था।
एक ओर दूसरे चबूतरे पर टीमों के बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की गई। दूसरे और तीसरे चबूतरे पर अन्य सम्भ्रान्त अभ्यागतों के बैठने के लिये स्थान सुरक्षित था। ठीक 3-00 बजे आज के प्रसिद्ध खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर मुख्य अतिथि के रूप में कार से पधारे। उनके मंच की ओर आते ही छात्राओं ने माल्यार्पण किया, साथ में पधारे इसी विद्यालय के संस्थापक मंत्री महोदय श्री वर्मा जी का भी स्वागत किया गया फिर आज के सबसे अधिक रोचक इस नगर के लिये अभूतपूर्व छात्राओं की हॉकी टीम का उद्घाटन मुख्य अतिथि जी ने करके इस कार्यक्रम को प्रारम्भ कराया। इसमें एक छात्राओं की टीम हमारे विद्यालय की तथा दूसरी दिल्ली पब्लिक स्कूल की थी। प्रथम बार इस समारोह को देखने के लिये फील्ड के चारों ओर के अतिरिक्त विद्यालय प्रांगण की सभी छतें तथा पास-पड़ोस के मकानों की छतें दर्शकों से खचाखच भरी थी। इसमें हमारे विद्यालय की टीम विजयी रही, फिर फाइनल मैच जो कि पहले से ही चल रहा था, उसका समापन हुआ। चित्रकारों ने अनेक चित्र लिये। अन्त में मुख्य अतिथि ने विजयी छात्रों को साधुवाद दिया तथा हारने वालों को और अधिक साहस से खेलने के लिये प्रेरित किया।
अन्य प्रतियोगिताएँ : दूसरे दिन साहित्यिक कार्यक्रम की बारी आई । सर्वप्रथम अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई । इस प्रतियोगिता का संचालन भी मुझे ही करना पड़ा । इस प्रतियोगिता में इस दिल्ली के लगभग 10 विद्यालयों ने भाग लिया। कुछ छात्रों ने बड़े ही मधुर कण्ठ से कविता पाठ किया। इस प्रतियोगिता में मेरा ही विद्यालय प्रथम आया। इसके बाद श्रेष्ठ कवियों की रचनाओं के पाठ की प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई जिसमें मेरे विद्यालय की छात्रा कु० विदुषी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।  सबसे अन्त में वाद-विवाद प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई । इसका विषय था -‘क्रान्ति के द्वारा ही विश्व शान्ति संभव है।’ एक विषय के पक्ष तथा विपक्ष में 8 विद्यालयों के 2-2 छात्रों ने भाग लिया। हरेक वक्ता को बोलने के लिये 7 मिनट का समय निर्धारित था। निर्णायक महोदय ने दिल्ली पब्लिक स्कूल, वसन्त कुंज को प्रथम तथा मेरे विद्यालय को द्वितीय घोषित किया।  इस दिन का कार्यक्रम समाप्त हुआ । इन प्रतियोगिताओं की अध्यक्षता हमारे प्राचार्य महोदय ने की थी।
कवि सम्मेलन तथा प्रदर्शनी : हमारे विद्यालय के कला प्रवक्ता ने एक विशाल कला प्रदर्शनी का आयोजन छात्र एवं छात्राओं के सहयोग से किया।  इस प्रदर्शनी का प्रात:काल 8-(00 बजे उद्घाटन शिक्षा मंत्री ने किया।  वे इन चित्रों को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। इस सुन्दर प्रगति के लिये उन्होंने कला के छात्र-छात्राओं, कला के प्राध्यापक तथा प्रधानाचार्य को साधुवाद दिया । शिक्षामंत्री के प्रदर्शनी देखने के पश्चात् यह सभी छात्रों एवं छात्राओं के देखने के लिए खोल दी गई। प्रदर्शनी का वातावरण अत्यन्त रागमय था। अनेक सुन्दर चित्रों को देखकर मन । ललचा जाता था। इस प्रदर्शनी में श्री यादव ने मेरी भी पुस्तकों के मुख्य पृष्ठ बड़े ही सुन्दर ढंग से बनाकर लगाए थे, वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे। कि मानो प्रत्यक्ष पुस्तक ही रखी हुई है। हर चित्र के नीचे उसके चित्रकार का नाम तथा उस चित्र के दाम लिखे थे। प्रवेश द्वार पर स्वागतम् तथा। निकास द्वार पर लिखा धन्यवाद बड़ा ही मनमोहक था।
प्रदर्शनी के कार्यक्रम के पश्चात सायंकाल कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कवि सम्मेलन की अध्यक्षता हिन्दी के प्रसिद्ध । कवि मधुर शास्त्री ने की। संचालन का कार्य मुझे ही स्वयं करना पड़ा। इस कवि सम्मेलन में स्थानीय कवियों के अतिरिक्त बाहर से भी कवि आए थे। कार्यक्रम का प्रारम्भ ‘वीणा वादिणी वर दे’ से हुआ। बहुत देर तक काव्य पाठ का रसास्वाद लिया गया और उस दिन का कवि सम्मेलन समाचारपत्रों की चर्चा का विषय बन गया।
 गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम : उत्सव के चौथे दिन प्रात: काल दस बजे से दिल्ली विद्यालय के अध्यक्षों एवं प्राचार्यों की एक बैठक का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता भूतपूर्व शिक्षामंत्री ने की। विचार-विमर्श का विषय था, ‘शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की समस्या।’ इसमें भाग लेने वाले वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने-अपने सुझाव प्रस्तुत किये । हमारे विद्यालय के प्राचार्य ने अपने अमूल्य विचारों को बड़े ही सुन्दर ढंग से सभी के सम्मुख प्रस्तुत किया। अध्यक्ष महोदय उनके सुझावों से विशेष प्रभावित हुए।
रात्रि को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रा के रूप में राखी की लाज’ नामक नाटक का मंचन किया गया। इस नाटक का उद्घाटन मुख्यमंत्री ने ठीक नौ बजे किया। इस अवसर पर अनेक व्यक्ति मौजूद थे। पंडाल चारों ओर से रंग-बिरंगे बल्बों तथा गुब्बारों से शोभायमान था। इस कार्यक्रम को देखने के लिये अपार भीड़ एकत्र थी तथा जनता में काफी आह्लाद था। प्रत्येक दृश्य पर छात्र नकद पुरस्कार प्राप्त कर रहे थे। कुल मिलाकर लगभग पाँच हजार रुपए के छात्र-छात्राओं ने पुरस्कार प्राप्त किए। किसी-किसी ने तो प्रसन्न होकर नाटक के प्रत्येक पात्र हेतु पुरस्कार घोषित किया। विशेष रूप से रानी दुर्गावती, भीलनी और तातार खाँ का कार्य सराहनीय रहा। विदूषक की ऊँची तोंद आज भी स्मरण आने पर विस्मित कर देती है। मध्य में श्रीकृष्ण की झाँकियाँ बड़ी रोचक थीं । यह कार्यक्रम रात्रि के 2 बजे तक चला। चित्रकार ने नाटक के प्रत्येक चित्र का अंकन किया।
प्रीतिभोज तथा पुरस्कार वितरण : वार्षिकोत्सव के अन्तिम पाँचवे दिन मध्याह्न बारह बजे एक सुसज्जित कक्ष में नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, अभ्यागतों एवं विजयी छात्र-छात्राओं को प्रीतिभेज दिया गया। दो घण्टे विश्राम करने के पश्चात् एक सुसज्जित पण्डाल में एक विशाल मंच मुख्य अतिथि हेतु और अन्य अनेक सोफासेट अभ्यागतों । हेतु तथा दूसरी ओर विजयी छात्रों हेतु बैठने की व्यवस्था की गई। ठीक चार बजे मुख्य अतिथि श्रीयुत् अशोक जी कुमार विभाग मंत्री, इन्द्रप्रस्थ विश्व हिन्दू परिषद् ने पर्दापण किया। उनके आगमन पर छात्रों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया।  एक छोटे छात्र ने उन्हें माल्यार्पण किया। हमारे प्राचार्य जी ने उनका परिचय दिया और उनसे पुरस्कार वितरण के लिए प्रार्थना की। मुख्य अतिथि जो आज के सभापति थे उन्होंने गतवर्ष बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने वाले छात्र अतिशय को एक शाल प्रदान की। फिर विद्यालय के सर्वश्रेष्ठ अनुशासित छात्र को पुरस्कृत किया गया। तत्पश्चात् क्रीड़ाओं में प्रथम आने वाले छात्रों को, फिर साहित्यिक प्रतियोगिताओं में प्रथम तथा द्वितीय आने वाले छात्रों को पुरस्कार तथा प्रमाण-पत्र प्रदान किये गये। इसी शुभ अवसर पर इस विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य, प्रथम अध्यापक व वयोवृद्ध अध्यापकों को भी माल्यार्पण कर सम्मानित किया गया।
मख्य अतिथि का भाषण तथा जलपान : तत्पश्चात् इस अवसर पर प्रकाशित कराई गई विद्यालय की रिपोर्ट को मन्त्री महोदय ने सभी के समक्ष पढ़ा। प्राचार्य जी ने विद्यालय की प्रगति का संक्षिप्त इतिहास । प्रस्तुत कर मुख्य अतिथि से दो शब्द कहने का निवेदन किया। सभापति जी ने अपने स्वागत के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि मुझे बालकों के मध्य उपस्थित होने में अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है। आज के छोटे-छोटे बच्चे उन छोटे-छोटे पौधों के समान हैं जो आगे चलकर एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर समाज को मीठे-मीठे फल प्रदान करेंगे । कल यही बालक हमारे देश के वकील, डॉक्टर, मन्त्री, इंजीनियर और राष्ट्रपति आदि बनेंगे। विजयी छात्रों को धन्यवाद और शेष के लिये शुभ कामनाएँ कीं कि वे भी पढ़ाई के साथ अन्य कार्यक्रमों में भी भाग लें तथा सफल होकर अपना तथा राष्ट्र का नाम उन्नत करें।
मुख्य अतिथि के भाषण के समापन के पश्र्चात् प्राचार्य जी ने उनके प्रति तथा उपस्थित जनता के प्रति आभार प्रकट किया।  उनको वे चाय के लिये एक सुसज्जित कक्ष में ले गये इधर सभी छात्र-छात्राओं को मिष्ठान्न वितरित किया गया।
उपसंहार : अन्त में प्रबन्धक महोदय जी ने इस दिवस के लिये सभी को धन्यवाद दिया और विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय की कार्य-दक्षता की भूरि प्रशंसा की। सभी छात्रों को आशीर्वाद दिया। उनके नेत्रों में छात्रों एवं अध्यापकों के स्नेह को देखकर आनन्द के अश्रु आ गये। अचानक छात्रों के कोलाहल को सुनकर दो दिन के अवकाश  की घोषणा कर छात्रों की जिज्ञासा को शान्त किया।