विद्यार्थी और फैशन

फैशन का अर्थ व कारण : शारीरिक प्रसाधनों से समाज के समक्ष आत्म-प्रदर्शन करना ही फैशन है। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार हीनभाव, आत्मप्रदर्शन, जिज्ञासा तथा आत्मप्रेम आदि फैशन के प्रमुख कारण हैं। इसी  कारण फैशन मानव स्वभाव के लिए स्वाभाविक माना गया है। वह सौंदर्य वृद्धि तथा सौंदर्य पिपासा की संतुष्टि हेतु सदैव फैशन की सेवा करता रहा है।
प्राचीन भारत में फैशन : पुरातन युग के ग्रंथों में वर्णित पुष्प श्रृंगार, उबटन, लेपन तथा चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों के प्रयोग और विभिन्न प्रकार की केश-सज्जा आदि इस के साक्षी हैं। अजन्ता, एलोरा और खजुराहो की स्थापत्य कला के विभिन्न नमूने इसी के सूचक हैं। आचार्य चाणक्य और वात्स्यायन आदि विद्वान् तो फैशन को एक अनिवार्य कला मानते रहे हैं। प्राचीन भारत में फैशन करने का अधिकारी सिर्फ सामाजिक गृहस्थों को ही माना जाता था। विद्यार्थी, संन्यासी, वानप्रस्थी और गुरु इस से पूर्णरूप से अछूते रहते थे। फलत: तत्कालीन युग में विद्यार्थी जीवन में फैशन त्याज्य समझा जाता था। अतः सादा जीवन उच्च विचार ही उसका जीवन तथा विद्यार्जन उसका लक्ष्य था।
आज का विद्यार्थी और फैशन : समय परिवर्तन के साथ-साथ मान्यताओं में परिवर्तन आयो। ‘खाओ पिओ और मौज उड़ाओ’ जैसी मान्यताओं और स्वच्छंद जीवन प्रणाली ने समाज के साथ-साथ विद्यार्थी वर्ग को भी बदल डाला। वह विद्या प्राप्ति के मूल लक्ष्य को भूलकर, समाज का अंधानुकरण करने लग गया और शीघ्र की फैशन का गुलाम बन गया। वह तंग वस्त्र, नए-नए डिजाइन और साज- शृंगार में पूरी तरह घिर गया। आज उसका शिक्षक गुरु न होकर टेलर मास्टर है, उसका विद्यालय सिनेमा भवन और रेस्टोरेंट हैं, उसकी पाठ्य पुस्तकें । फैशन सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाएँ हैं तथा उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है नए-नए फैशन की खोज करना। फैशन का यह ज्वर नगरों तक ही सीमित नहीं रहा ; बल्कि ग्रामों तक में फैल गया है। सीधे सादे ढंग से रहने वाला छात्र आज बुद्ध, मूर्ख और गणेश जी कह कर पुकारा जाता है। फैशन न करने पर मित्र मंडली में दुत्कारा जाता है और तथाकथित शिक्षित समाज में ठुकराया जाता है। फलत: अधिकांश विद्यार्थी फैशन के पीछे दीवाने हो चुके हैं।
फैशन के दुष्परिणाम : किसी भी व्यक्ति की वेश-भूषा से उसके चरित्र, रहन-सहन और विचारों का पता आसानी से लगाया जा सकता है। बहुधा देखा गया है कि निर्धन छात्र अधिक खर्चीला, बदसूरत अधिक मे अकप करने वाला, परिवार या समाज से उपेक्षित विद्यार्थी सस्ता तथा अधिक फैशन करने वाला होता है।
उपसंहार : फैशन ऐसी जोंक है यदि इसे दूर न किया गया, तो यह युवा समाज का सारा खूनं-चूस जाएगी । इसके लिए अभिभावकों और शिक्षकों को युवा वर्ग के सामने आदर्श रखने चाहिए। गाँधी जी के सिद्धान्त ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की शिक्षा देकर उन्हें प्रेरित करना चाहिए। इसके साथ ही युवा वर्ग को, उपयोगी कार्यों में लगाकर तथा उनका मनोवैज्ञानिक उपचार करा कर भी फैशन रूपी पिशाचिनी से पीछा छुड़ाया जा सकता है। फैशन का अंत ही जनहित है। अत: इस से मुक्ति दिलाने के यथाशीघ्र प्रयास किए जाने चाहिए ।