मानव की चंद्रयांत्रा


प्रस्तावना : मानव  स्वभावत: जिज्ञासु है। जैसे-जैसे  उसका ज्ञान बढ़ता जाता है। वैसे-वैसे ही उसकी ज्ञान की  पिपासा और अधिक बढ़ती जाती है।  मानव की इस जीवन-व्यापिनी जिज्ञासा ने विज्ञान के अनेक आविष्कारों को जनम दिया है। अतीत की अनेक घटनाएं मानव-कल्पना मात्र ही समझता था। आज से कुछ समय पहले लोग पुष्पक विमान का नाम सुनकर उपहास करते थे। अनेक परियों की कहानियाँ जिनमें चाँद-सितारों के जगत की यात्रा कल्पना मात्र समझी जाती थीं। विज्ञान के आविष्कारों ने आज अनेक असम्भव घटनाओं को सम्भव कर दिया है। स्वाभाविक जिज्ञासा शान्ति के लिये मानव ने वैज्ञानिक आविष्कारों की सहायता से अपने चरण सौर मण्डल तक पहुँचने की ओर बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया है।
चन्द्रमा के विषय में विभिन्न धारणाएँ : धार्मिक ग्रन्थों में चन्द्रमा को देवतास्वरूप स्वीकार किया गया है। ऋग्वेद में चन्द्रमा का अत्यधिक महत्त्व है। साहित्यिक लोग सौन्दर्य के लिए चन्द्रमा को उपमान रूप में प्रयुक्त करते हैं। बन्धुहीन माताएँ चन्द्रमा को अपना भ्राता मानकर अपने बच्चों को उसका चन्दा मामा के रूप में परिचय देती हैं। भारतीय ज्योतिषियों ने चन्द्रमा को नवग्रह में स्थापित कर अनेक फलों का वर्णन किया, किन्तु वैज्ञानिकों के दूरवीक्षण यन्त्र कुछ अन्य आकांक्षा के लिए आकाश का कोना-कोना छान रहे थे। साधना किसी की व्यर्थ नहीं जाती, परिणामस्वरूप वैज्ञानिकों को अपने कार्य में सफलता मिली है।
चन्द्रमा एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण : वैज्ञानिकों ने गगन में चमकते ज्योति पिण्डों को पार्थिव रूप में देखा। उन्होंने सिद्ध किया है कि ज्योति पुंज भी पृथ्वी के समान ही अस्तित्व रखते हैं और दूरी के कारण छोटे और सौर प्रकाश के कारण प्रकाशवान प्रतीत होते हैं। प्राचीन रूढ़िवादियों ने इन वक्तव्यों का उपहास किया ; किन्तु नवीन ज्योतिर्विदों ने अपनी साधना को आगे बढ़ाया। उन्होंने अनेक निष्कर्ष निकाले । ग्रहों की दूरी का अनुमान लगाया और सबसे समीप उपग्रह चन्द्रमा को मुस्कराता पाया, जबकि अन्य ग्रह करोड़ों मील की दूरी पर हैं; किन्तु चन्द्रमा दो लाख और कुछ सहस्र मील की दूरी पर ही स्थित है। अत: वैज्ञानिकों ने अपना प्रथम लक्ष्य चन्द्रमा को ही चुना।
कल्पना द्वारा वास्तविक जगत की सम्भावना : जैसे-जैसे। समय व्यतीत होता जाता है। प्राकृतिक विषयों में मानव की अभिरुचि विकसित होती जाती है। कल्पना जगत से वास्तविक जगत में मानव ने आने का दृढ़ निश्चय किया । मानव चन्द्र तक पहुँचने की योजना केवल कल्पना की ऊँची उडान मात्र ही नहीं थी; अपितु उसका आधार वास्तविक संगणना थी। वैज्ञानिकों ने स्वप्न और कल्पना को यथार्थ के धरातल पर उतार कर रख दिया। यातायात के ऐसे साधन तैयार किए जा रहे हैं कि जिनके द्वारा हम सुबह से शाम तक चन्द्रलोक की यात्रा करके वापस आ सकेंगे।
चन्द्र-विजय की तैयारी, रूस के प्रयास : इस कार्य के लिए विशाल धनराशि की आवश्यकता थी। अत: धनवान देश रूस और अमेरिका ने इस ओर बढ़ने का निश्चय किया। सर्वप्रथम रूसी वैज्ञानिकों ने 4 अक्तूबर 1957 को प्रथम, ‘स्पुतनिक’ छोड़ा। स्पूतनिक का पर्यायवाची शब्द हिन्दी में ‘बालचन्द्र’ है। स्पुतनिक रूसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘सहयात्री’ या ‘साथ चलने वाला।’ चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है, उसी प्रकार यह बनावटी बालचन्द्र भी पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। इस छोड़े गए स्पूतनिक का व्यास 58 सेमी तथा भार 83.6 किलोग्राम। था। इसके राकेट की चाल 18,000 मील प्रति घण्टा थी। इसने लगभग 600 मील पर जाकर 184 पौण्ड आर के उपग्रह को अपने से अलग कर दिया और उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने लगा।
इसने 94 दिनों में पृथ्वी के 1440 चक्कर लगाये। फिर 3 नवम्बर सन् 1957 ई० को ‘लाइका’ नामक कुतिया तथा दो बन्दरों के साथ एक स्पतनिक भेजा जिसमें कुतिया तो मर गई तथा बन्दर वापस आ गए। द्वितीय उपग्रह के उपरान्त रूस ने अपना चतुर्थ उपग्रह 1 जनवरी सन् 1958 को छोड़ा। इसका राकेट चन्द्रमा से 3000 मील दूर होकर सूर्य की ओर चला गया और उसने एक छोटे से ग्रह का रूप धारण कर लिया। इसके कुछ ही समय उपरान्त 12 अप्रैल 1960 में रूस ने एक अपूर्व साहसी मानव श्री युरीगगारिन’ को बैठाकर स्पूतनिक द्वारा चन्द्रलोक की तरफ भेज दिया जिससे 108 मिनट में पृथ्वी की परिक्रमा की। गगारिन ने बताया कि पृथ्वी गोल थी और रंग नारंगी जैसा था। तत्पश्चात् ‘मेजर टिटोब’ ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। अबकी बार तो व्योम-यात्री लगभग तीन-तीन दिन तक गगन-विहार करने के उपरान्त सकुशल पृथ्वी पर लौट आए। आज भी रूस के वैज्ञानिक इस क्षेत्र में शान्त नहीं हैं, वे आये दिन नये-नये प्रयोगों में संलग्न हैं।
अमेरिका के प्रयास : सोवियत रूस से प्रेरित होकर अमेरिका ने भी चन्द्र तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय किया । सर्वप्रथम अमेरिका ने 1 फरवरी सन् 1960 ई० को एक उपग्रह छोड़ा। इसका भार 30 पौड था तथा चाल 19,400 मील प्रति घण्टा थी। उसने पृथ्वी का चक्कर 106 मिनट में पूर्ण किया । इस उपग्रह के उपरान्त अमेरिका ने अपना 3,114 पौण्ड के भार का द्वितीय उपग्रह 17 मार्च 1960 को छोड़ा, इसने 135 मिनट में समस्त पृथ्वी का चक्कर लगा लिया । सन् 1961 में एलन सेफर्ड महोदय ने अपनी चन्द्रलोक की यात्रा प्रारम्भ की। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री केनेडी महोदय ने प्रतिज्ञा की थी कि 1970 ई० से पहले ही चन्द्र-यात्रा सफल होनी चाहिए। “धीर पुरुष निश्चित लक्ष्य से नहीं रुकते हैं।” इस सूक्ति के अनुसार बारम्बार अमेरिका ने चन्द्रलोक जाने के लिए ऐसा विमान कल्पना द्वारा बनाया जो चन्द्रलोक को जाकर लौट आए।यह विमान अपोलो नाम से विख्यात हुए।
दिसम्बर 1968 में अपोलो-8 ने 3 अन्तरिक्ष यात्रियों सहित चन्द्रमा के 10 चक्कर लगाए। अमेरिका ने मानव को चाँद पर भेजने के लिए अपोलो-11 की योजना तैयार की। उसके अनुसार 36 फीट ऊँचे अन्तरिक्ष यान का निर्माण किया गया जिसके दो भाग थे। 16 जुलाई 1969 को यह विमान 7 बजकर 2 मिनट पर कैप कैनेडी विशाल ध्वनि के साथ आगे बढ़ा। इसमें तीन यात्री-नील आर्मस्ट्रांग, एडविन सल्टिन एवं माइकल कालिस थे। अन्तिम गति 25000 मील प्रति घण्टा को प्राप्त कर यह यान पृथ्वी की कक्ष से निकल कर चन्द्र कक्ष में पहुँच गया। 21 जुलाई को चन्द्र कक्ष कमान कक्ष से पृथक होकर प्रथम दो यात्रियों को लेकर चन्द्र तल पर अवतरित हुआ। 21 जुलाई 1969 को 10 बजकर 42 मिनट के ऐतिहासिक समय पर नील आर्मस्ट्रांग ने चन्द्रतल का स्पर्श किया। फिर उनका साथी भी वहाँ उतर गया। उन्होंने वहाँ के दृश्य का अवलोकन किया। नील ने कहा, “चन्द्रतल सख़्त है और वहाँ की मिट्टी रेगिस्तान जैसी है” एल्ड्रिन ने वहाँ के दृश्य की और वहाँ की चट्टानों को बैंगनी रंग का बताया। फिर दोनों ने अनेक यन्त्र स्थापित किए तथा वहाँ अपने देश का ध्वज स्थापित किया। 22 जुलाई 1969 को रात्रि में 3 बजकर 2 मिनट पर वह अटलांटिक सागर में हवाई द्वीप के समीप सकुशल उतर आया।
पूर्ण सफलता : इस चन्द्र अभियान की सफलता ने मानव के साहस की वद्धि की है। इसके बाद अपोलो-12 भी चन्द्रमा पर सफलतापूर्वक यात्रियों सहित उतरा और सकुशल वापस आ गया। तदुपरान्त अपोलो-13, तेरह अप्रैल 1970 को पृथ्वी से चला; किन्तु आगे जाकर ऑक्सीजन टैंक में विस्फोट हो गया। अतः वैज्ञानिकों ने इसे वापस लौटाया और 17 अप्रैल को यह यान अपने यात्रियों को सम्हाले हुए सकुशल वापस आ गया। इसके बाद 26 जुलाई 1971 को इस विस्फोट का पता लगाने के लिए अपोलो-15 जीप, मोटरगाडी की सुविधाओं के साथ चाँद तक पहुँचा और उसने पर्वतीय क्षेत्रों का अन्वेषण किया। पुनः 6 फरवरी 1971 को अमेरिका का चन्द्रयान चन्द्रमा पर पहुँचने में सफल हो गया।

चन्द-विजय से अनुमानित लाभ : चन्द्र-विजय से कई नए तथ्य सामने आए हैं। वैज्ञानिक जहाँ पहले चन्द्रमा की उत्पत्ति पृथ्वी से मानते थे, अब उन्हें मानना पड़ा है कि चन्द्रमा पृथ्वी से बहुत अधिक प्राचीन है। चट्टानों के नमूने 3 अरब 10 करोड़ वर्ष प्राचीन हैं। चन्द्रमा की धूलि में 50 प्रतिशत काँच है। वहाँ बहुत बड़े-बड़े क्रेटर (गर्त) हैं और चन्द्र-भूमि पर कुछ इंच मोटी धूल है जिसके नीचे कड़ी चट्टानों का अस्तित्व है। जिस प्रकार पृथ्वी से चन्द्रमा चमकीला दिखाई देता है इसी प्रकार चन्द्रमा से पृथ्वी चमकती हुई प्रतीत होती है। चन्द्र दिन और रात पृथ्वी से चौदह गुने होते हैं। चन्द्रमा की पृथ्वी से अधिकतम दूरी 4,06863 किलोमीटर है। अभी प्राप्त पाषाणों का विश्व के वैज्ञानिक परीक्षण कर रहे हैं, पूर्ण परीक्षण के बाद सही निर्णय होगा।
चन्द्र-विजय को यदि हम दूसरे दृष्टिकोण से देखें कि इतना अधिक व्यय करने से क्या लाभ, तो जहाँ अभी इतनी हानि हुई है, भविष्य में यदि रहने को स्थान तथा मूल्यवान वस्तुएँ चन्द्रमा पर मिले गईं, तो पर्याप्त लाभ होगा; ऐसी आशा भी है।
उपसंहार : वैज्ञानिक प्रगति की और अधिक सम्भावना है। अमेरिका ने घोषणा की थी कि शीघ्र ही मनुष्य मंगल ग्रह में पहुँच जायेगा। यदि यह अग्रिम कार्यक्रम सफल हो गए, तो जनसंख्या तथा प्रलय आदि का भय समाप्त हो जायेगा। भविष्य की इस योजना के लिए पूर्ण विश्वास के