यदि मैं डाक्टर होता

हमारे देश में डाक्टरों की बहुत माँग है। नित्य नवीन डाक्टरों के अस्पताल खुलते रहते है, सभी पर रोगियों की भीड़ लगी रहती है, फिर भी हमारे देश की जनसंख्या के अनुपात में डाक्टरों की संख्या कम है। गरीब बीमार जनता को डाक्टरों को मनमानी फीस देनी पडती है, फिर भी सफल चिकित्सा कोई-कोई डाक्टर ही कर पाता है। इस समस्या को देखकर मैं सोचता हूं- काश! मैं भी एक डाक्टर होता!
मैं ऐसे स्थान को अपना दवाखाना लगाने के लिए चुनता जहाँ गरीब बस्ती होती और दूर दूर तक उस बस्ती की सेवा के लिए कोई डाक्टर न होता। किसी गाँव में अगर सुविधा मिलती तो मैं वहीं दवाखाना खोलता। मै देखता हूँ कि डाक्टर बेरोजगार रहना पसंद करते है पर किसी गाँव में जाकर नहीं रहना चाहते, वे शहर में ही दवाखाना लगाना चाहते हैं, जहां पहले से ही अधिक दवाखाने रहते हैं। एक तरफ तो शहरों में दवाखानों की भरमार रहती है, तो दूसरी तरफ गाँव वालों को बीमारियों से बचाने के लिए दूर-दूर तक डाक्टर नहीं मिलता।
डाक्टरी व्यवसाय में आमदनी अधिक है। अधिकतर डाक्टर धन कमाने की आकांक्षा से दवाखाने लगाते हैं, पर मेरी इच्छा डाक्टरी द्वारा धन कमाने की कम रोगियों की सेवा करने की अधिक है। उसमें भी जो धनवान है उनसे तो उचित फीस लूंगा ही पर जो गरीब असमर्थ हैं, उनकी चिकित्सा मैं निःशुल्क करूँगा। मैं सेवा का व्रत लेना चाहता हूँ। असहाय गरीबों की सेवा चिकित्सा करना चाहता हूँ।
मैं जानता हूँ कि एक सफल डाक्टर को मिष्टभाषी, मनोवैज्ञानिक तथा सहानुभूति से व्यवहार करने वाला होना चाहिए। डाक्टर का मृदुल व्यवहार ही रोगी का आधा रोग हर लेता है। मैंने कई सहृदय डाक्टरों को देखा है, जो रोगी को बातों में आकर्षित करके अनायास ही उसकी दुखती रग को पकडकर आराम पहुँचा देते हैं। मैं भी उन्ही जैसा बनना चाहता हूँ। अपने रोगी को कम से कम पीड़ा पहुँचाकर उसके रोग का उपचार करने में सफल रहना चाहता हूँ।
मैंने देखा है कि अनेक डाक्टर असहाय अवस्था में पडे हुए रोगी को घर जाकर देखना नहीं चाहते। वे उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं। रात के समय किसी गम्भीर दशा के रोगी की परीक्षा एवं उपचार करने के लिए वे अपनी नींद खराब नहीं करना चाहते। जब डाक्टरी का पेशा अपनाया है, तो सेवा और त्याग करना ही मानवता का लक्षण है। मुझे किसी के घर जाने या रात की नींद की चिन्ता किए बिना सेवा करने में कोई रुकावट नहीं होगी। मेरा उद्देश्य-जैसा कि मै कह चुका हूँ-सेवा का अधिक है धन कमाने का गौण।
यदि मैंने दवाखाना शहर में लगाया तो भी गाँव वालों की सेवा अवश्य करूंगा। सप्ताह में एक या दो दिन किसी गांव में जाकर वहां की जनता की सेवा करूंगा। गांव के लिए मेरे दिन और समय निश्चित रहेगा। गाँव वालों को उसकी सूचना होगी।
मैं अपने व्यवसाय में कुशलता से काम लूंगा। रोग के निदान में जल्दबाजी करना निरोग को भी रोगी बना देने जैसा है। सावधानी से समय लेकर निदान होने के पश्चात औषधियों का उपयोग करूंगा। बहधा देखा गया है कि दर्द एक दाँत में है तो डाक्टर गफलत में दसरा अच्छा दाँत उखाड़ देते हैं। यदि खराबी दाई आँख में है तो आपरेशन बाँई आँख का कर डालते हैं।
कई बार सुनने में आया है कि डाक्टरों ने आपरेशन करके अपनी कैंची रोगी के शरीर में ही छोड़ दी। इससे आपरेशन के कई दिन के बाद रोगी को महान पीड़ा सहनी पड़ी। यह सब डाक्टरों की असावधानी और जल्दबाजी के कारण हुआ। मैं अपने काम में कभी असावधानी नहीं बरतूंगा। इस प्रकार का कोई अवसर देने से पूर्व मैं मर जाना ही श्रेष्ठ समदूंगा। यदि कोई रोगी मेरी सामर्थ्य से बाहर होगा तो मैं उसे प्राथमिक उपचार करके किसी विशेषज्ञ को दिखाने की राय दे देना ही उचित समयूँगा।
मै चाहूँगा कि मैं एक सहृदय मनुष्य बनें। दीन दुखियों की अपने ज्ञान और अनुभव द्वारा सेवा करूँ। किसी को कष्ट पहुँचाए बिना उसके कष्टों को दूर कर सकूँ। मैं एक आदर्श नागरिक बनना चाहता हूँ। भगवान मुझे ऐसी बुद्धि एवं शक्ति दें।