मूल्य वृद्धि


मूल्यों में निरन्तर वृद्धि होते रहना भारत की एक ज्वलंत समस्या है। इसका सम्बन्ध अर्थ से जुड़ा है। किसी समय भारत में दध की नदियाँ बहती थी। इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस देश में अपार समृद्धि एवं वैभव था। पर आज जो स्थिति है उसे देखकर उपरोक्त बातों पर विश्वास ही नहीं होता।
अंग्रेजों के शासन में यहाँ के स्त्रोतों का पर्याप्त दोहन हुआ। यहाँ की सम्पूर्ण समृद्धि विदेशों में चली गई। आज भारत की जनता का अधिकांश भाग गरीबी की रेखा से नीचे रह रहा है। भारत की प्रतिव्यक्ति आय का औसत भी अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम है।
प्रतिवर्ष महंगाई बढ़ती चली जा रही है। एक बार जो भाव बढ़ गए फिर नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेते। मूल्य वृद्धि का मुख्य कारण तो वस्तु का अभाव होता है। अर्थ शास्त्र का सिद्धान्त है कि जब वस्तु की मांग बढ़ जाती है तो मूल्य में वृद्धि हो जाती है। जब वस्तु की आपूर्ति बढ़ जाती है, तो उसकी माँग कम हो जाती है और मूल्य गिरने लगते हैं।
महंगाई की बढ़त खाद्यान्नों तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कमी के कारण होती है। गेहू, चावल, मोटे अनाज, दालें, तेल तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कमी के कारण महंगाई में वृद्धि होती जा रही है।
भारत की सभी समस्याओं के मूल में यहाँ की जनसंख्या वृद्धि पण रहता है। महंगाई की वृद्धि का भी कारण यही है। हमारी जनसंख्या प्रतिवर्ष करोड़ों में बढ़ती जारही है। उत्पादन के साधन तो ने ही बने हैं। जो भी उत्पादन होता है वह बढ़ी हुई जन संख्या के लिए पर्याप्त नहीं होता। कमी मूल्य वृद्धि का कारण बनती है। मूल्य बटि के कारण रुपए का अवमूल्यन हो रहा है। 50 वर्ष पूर्व रुपए का जो मूल्य था, आज वह 15 पैसे रह गया है।
द्वितीय विश्व युद्ध से ही मूल्य वृद्धि की प्रवृत्ति प्रारंभ हो गई थी। अंग्रेजों ने भारत के सभी उत्पादों का युद्ध के लिए प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था। देश में प्रत्येक वस्तु का अभाव हो गया। कपड़ा, आहार, पेट्रोल युद्ध सामग्री भारत से बाहर जाने लगी। इन वस्तुओं की कमी के कारण मूल्यों में वृद्धि होने लगी। जो अब तक जारी है।
अब स्थिति यह है कि बढ़ती हुई खपत में तो रोक लगाकर मूल्यों में कमी करना संभव नहीं है। यदि महंगाई दूर करने का कोई साधन है तो उत्पादन बढ़ाना है। अनाज का उत्पादन आज देश में पर्याप्त होने लगा है। पर मूल्य वृद्धि रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। दालों और तिलहनों की देश में भारी कमी है। ये दोनों ही मूल्य वृद्धि के मुख्य कारण हैं। हमें अपनी सरकार की कारगुजारी पर तरस आता है, कि इतने दिनों से कमी का अनुभव करते हुए भी उनके उत्पादन की वृद्धि पर कोई ध्यान नहीं दे सकी है। तम्बाकू जैसी हानिकारक जिन्स का उत्पादन करने के लिए हजारों एकड़ भूमि का प्रयोग किया जाता है। उसके स्थान पर यदि दालों और तिलहनों का उत्पादन किया जाए तो मूल्य वृद्धि पर कुछ नियंत्रण रखा जा सकता है।
हमारे निर्यात की नीति दोषपूर्ण होने से महंगाई बढ़ रही है। हमारे देश के लिए अपर्याप्त उत्पादन होने पर भी शक्कर का निर्यात किया गया। शक्कर की कमी के कारण शक्कर के मूल्यों में अनाप शनाप वृद्धि होगई। आवश्यकता की पूर्ति के लिए विदेशों से शक्कर का आयात किया गया। विदेशी चीनी पर्याप्त महंगे दामों में उपलब्ध हर और मूल्यों का सूचकांक बढ़ गया।
देश में विदेशी ऋणों की प्राप्ति भी महंगाई वृद्धि के लिए उत्तरदायी है। देश में ही पर्याप्ति धन उपलब्ध न होने के कारण विदेशों से उधार लेना पड़ रहा है। इस कर्ज पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए ब्याज के रूप में देने पड़ रहे हैं। इसका भार जनता पर ही महंगाई के रूप में पड रहा है। जब तक हम अपने ही साधनों से अपना व्यय पूरा करने योग्य बन जाएंगे इस समस्या से मुक्ति नहीं मिलेगी।
मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए सरकारी करों में कमी करने की आवश्यकता है। बहुत सी उपभोक्ता सामग्री सरकारी कारखानों में उत्पन्न होती है। जिस वस्तु का लागत मूल्य एक रुपया है वह करों के कारण उपभोक्ता को पाँच रुपए में प्राप्त होती है।
व्यापारी वर्ग भी महंगाई को ध्यान में रखकर वस्तुओं की कृत्रिम कमी करके उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य अनाप शनाप बढ़ा देते हैं। वे केवल अपना स्वार्थ तथा अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से मूल्यों को अपने नियंत्रण में रखते हैं। नैतिकता का तकाजा है कि लाभ के प्रतिशत में असाधारण वृद्धि न की जाए। किसी भी व्यापार में 25 प्रतिशत से अधिक लाभ के प्रतिशत पर नियंत्रण रख कर महंगाई पर रोक लगानी चाहिए। कितने भी प्रयत्न किए जाँए जब तक समाज में भ्रष्टाचार व्याप्त है, नैतिकता की उपेक्षा है, तब तक हमें सफलता मिलनी संभव नहीं है। महंगाई का चक्र चलता ही रहेगा।