भूकम्प का प्रकोप

भूकम्प का धक्का प्रबल था। एक बहुत बड़े क्षेत्र में इसका प्रभाव पडा। कई गाँवों में त्राहि त्राहि होने लगी। गाँवों के लगभग सभी मकान गिर गए। उनके निवासी उनके मलबे में ही दबे रह गए। परिवार के परिवार भूमि निगल गई। रात का समय होने के कारण किसी को कुछ भी नहीं सूझा। रात में ही भूकम्प के तीन-चार झटके आए।
उन गाँवों के मकानों की बनावट के कारण धन-जन की अपार हानि हुई। कच्ची मिट्टी के गारे से बड़े-बड़े पत्थर जोड़कर दीवारें बनाई गई थी। वे सबकी सब ढहकर सोते हुए लोगों पर गिर पड़ी। वे सोते के सोते ही रह गए। जो कुछ दैववश बच सके, उनकी संख्या नगण्य थी। उनमें भी कोई बालक अनाथ रह गया था, या कोई बूढ़ा असहाय बेसहारा रह गया था। प्रकृति की कैसी विडम्बना थी।
प्रातःकाल इस संकट का समाचार चारों ओर व्याप्त हो गया। समीप के गावों से यह नृशंस नर संहार देखने, असहायों की सहायता करने समीप के गाँवों से लोग आने लगे। सरकार को भी इस दुर्घटना की सूचना मिली। उसके कर्मचारी भी संकटकालीन व्यवस्था के साथ घटना स्थल पर आए।
कराहते दम तोड़ते, मरे हुए लोगों को खण्डहरों में से निकालने के प्रयत्न शुरू हो गए। पत्थरों को उठा-उठाकर दूर इकट्ठा किया गया। मलवे में से निकले शवों का ढेर लग गया। उनकी पहचान करना भी कठिन थी। यह कार्य लगभग एक सप्ताह तक चलता रहा। बचे हुए लोगों को एक कैम्प लगाकर उनके भोजन पानी एवं आवास की व्यवस्था की गई। सरकारी सहायता के लिए कार्यालय वहाँ खोल दिए गए।
पूरी की पूरी बस्तियाँ उजड़ गई थीं। सरकारी तौर पर वहाँ नए मकान बनाए गए। अब जो मकान बने है वे ऐसे हैं कि भूकम्प आने पर भी उनसे धन जन की हानि न हो सके।
भूकम्प प्रकृति का एक अत्यंत भयंकर रूप है। इसके जोरदार धक्के से पलभर में महा-विनाश होता है, हा-हाकार मच जाता है। जल पृथ्वी के भीतर तरल पदार्थ अधिक गर्म हो उठते हैं, तो उनकी भाप का दबाव बढ़ जाता है। यह भाप बाहर आना चाहती है और पूरी शक्ति से पृथ्वी की ऊपरी सतह को धक्का देती है। तभी भूकम्प होता है।
भूकम्प से धरती में दरारें पड़जाती है। भवन धराशायी होजाते हैं। भूकम्प की जरासी हलचल से हजारों मनुष्य मौत के घाट उतर जाते हैं। परिवार के परिवार नष्ट हो जाते हैं। सड़कें टूट जाती है। जन जीवन छिन्न भिन्न हो जाता है। देखते ही देखते लाखों की सम्पत्ति और वर्षों का सृजन मिट्टी में मिल जाता है।
एक बार सन 1935 में बिहार में बड़ा भूकम्प आया था। पटना शहर में गंगा की धारा अवरुद्ध हो गई थी। चार पाँच मिनट तक गंगा का पानी भूमि गत हो गया था। पानी के जीव जन्तु रेतपर छटपटाने लगे थे। देखते ही देखते ऊपर से पानी आया। नदी का बहाव फिर से प्रारंभ हुआ। जीव जन्तु भी सामान्य दशा में आगए।
प्रकृति का यह ताण्डव देखते-देखते नगरों को खण्डहरों में बदल देता है। नदियों के प्रवाह को बदल देता है। मरुस्थल मधुर स्थल बन जाते है। पर्वत भूमिगत हो जाते हैं। विनाशकारी माना जाने वाला। भूकंप कभी – कभी नई संस्कृति और सभ्यता को भी जन्म देता है।
ऐसी विपत्ति में ही मानवता की परीक्षा होती है। इस विनाशकारी प्रकृति के प्रकोप की पूर्व सूचना या रोकथाम के लिए विज्ञान को अभीतक सफलता नहीं मिली है। ऐसे समय में मनुष्य को वस्त्र, औषधि आदि से पीड़ितों की सहायता करनी चाहिए। यही मानव धर्म