बेरोजगारी


भारत वर्ष में दिन प्रतिदिन बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में यह समस्या सिर उठाए खटी है। जितने भी प्रयत्न उसे दूर करने के लिए किए जा रहे हैं, वे कुछ भी प्रभाव दिखाने में असफल रहे हैं। देश को इस समस्या के समाधान के लिए गंभीर प्रयत्न करने की आवश्यकता है।
जन संख्या में निरन्तर वृद्धि इसका एक प्रमुख कारण है। जन संख्या में वृद्धि, रोजगार के सीमित अवसर ही बेरोजगारी की समस्या को जन्म देते हैं।
गांधी जी ने बहुत पहले ही इस समस्या पर अपना ध्यान केन्द्रित किया था। उन्होंने सबसे बड़ा दोष शिक्षा प्रणाली में पाया। उन्होंने भारत के अपने घरेलू उद्योग धंधे अंग्रेजों की चलाई शिक्षा के कारण नष्ट होते हुए देखे। आधुनिक शिक्षा के प्रचार से विद्यार्थी पारंपरिक रूप से अपना चला आता पारिवारिक धंधा भूल जाता है। शिक्षा उसे केवल नौकरी करने योग्य बना कर छोड़ देती है। नौकरियों की संख्या इतनी सीमित है कि इतनी विशाल जन संख्या का बीसवां भाग भी इनमें नहीं समा सकता। शेष लोग बेरोजगार बन जाते हैं। वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते।
देश में बड़े बड़े कारखाने लगजाने से हजार मजदूरों द्वारा किया जाने वाला कार्य केवल 100-50 आदमी ही पूरा करने लगे। कपडा मिलों के बनने से देशभर में नजाने कितने बुनकर बेरोजगार हो गए। गांधी जी इसी कारण भारी मशीनों की स्थापना के विरोधी थे। उनकी आवाज इस विषय में नहीं सुनी गई। परिणाम स्वरूप बेरोजगारी सामने है।
सभी कार्यालयों में अब कम्प्यूटरों से काम लेना प्रारंभ हो गया है। 100 कर्मचारियों का काम एक कम्प्यूटर कर डाल है। इसके परिमाण स्वरूप कार्यालयों में कर्मचारियों की छटनी प्रारंभ हो रही है। बेरोजगारी बढ़ने के लिए यह भी सहायक है।
गाँवों में तेजगारी का स्वरूप अलग है। यहाँ किसानों को वर्ष में केवल छ: या सात महीने ही काम रहता है। शेष समय वे बेरोजगार ही रहते हैं।
उपरोक्त बताए गए कारणों को दूर करने से ही बेरोजगारी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। सबसे पहले जन संख्या वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। नगरों में तो इस समस्या पर शिक्षण द्वारा कुछ नियंत्रण हो रहा है। पर गाँवों में सरकारी प्रयासों का प्रभाव नहीं के बराबर है। देश का अधिकांश भाग गाँवों में ही है। अतएव परिवार नियोजन का प्रचार गाँवों में प्रभावी रूप से होना आवश्यक है।
शिक्षा के क्षेत्र में गांधीजी ने इस समस्या को लेकर एक प्रयोग किया था। उन्होंने बेसिक शिक्षा के नाम से ऐसी शिक्षा प्रणाली निकाली थी कि एक मैट्रिक पास विद्यार्थी स्वयं अपने पैरों पर खड़ा हो सके। वह नौकरी की ओर न ताके। प्रारंभ से ही शिक्षा किसी हस्तकला पर आधारित होती थी। मैट्रिक पास करने तक विद्यार्थी उस हस्तकला में इतना पारंगत हो जाता था कि वह स्वयं का कुटीर उद्योग चला सके। इससे बेरोजगारी की समस्या का कुछ सीमा तक समाधान होता था। अभी भी इस प्रकार की शिक्षा की समयानुकल योजना बनाई जा सकती है।
भारी उद्योगों का विकास करके उनमें रोजगारों के अवसर बढाण जाने चाहिए। सरकार इसके लिए विदेशों द्वारा पूंजी लगाकर बड़ी बड़ी योजनाएँ लगवाने का प्रयत्न कर रही है। विदेशी कम्पनियाँ दरा देश में अपने भारी उद्योग लगाने की ओर आकर्षित हो रही है। उनका प्रयत्न सफल होने से भी बेरोजगार युवकों को काम मिल सकेगा।
कृषि का भी इस प्रकार विकास किया जाना चाहिए कि किसानों को वर्ष भर काम मिले। इसके लिए सिंचाई के उपयुक्त साधनों को उपलब्ध कराना चाहिए। सिंचाई की सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में किसान निठल्ला नहीं बैठता। जहाँ इस प्रकार की सुविधा पहुँचने में कठिनाई हो. वहाँ अंशकालिक उद्योग जैसे रस्सी बटना, दुग्ध उत्पादन, रेशम उत्पादन, मधु मक्खी पालन जैसे उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए।
सरकार की नीतियाँ देश में औद्योगिक इकाइयों को बढ़ाने की होनी चाहिए। जितना ही अधिक उद्योगों का विकास होगा बेरोजगारी की समस्या का समाधान होता जाएगा। सरकार की एक रोजगार योजना का नाम जवाहर रोजगार योजना है। पर इसका संचालन गलत हाथों के द्वारा होने के कारण सरकार का धन तो व्यय होता है। पर उसका लाभ बेरोजगारों को नहीं मिलता। उनके नाम पर झूठे बिल बनाकर मध्यस्थ ही शतप्रतिशत खाजा रहे हैं। इससे बचने का कोई ठोस उपाय निकालना चाहिए।