शिक्षा का माध्यम


माध्यम की आवश्यकता विषयको ठीक से समझने के लिए होती है। इसके लिए जो भी साधन उपयुक्त हो, उसे ही माध्यम कहते हैं। भारतवासी जिस साधन द्वारा विषय का सुगमता से ग्रहण कर सकते हैं वही उसकी शिक्षा का माध्यम होना चाहिए।
भारत में जब अंग्रेज शासक थे तब उन्होंने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया। पर अंग्रेजी भाषा का माध्यम उन्ही लोगों को लाभकारी था जिन्होंने अपनी मातृभाषा भी अंग्रेजी बना ली थी। अंग्रेजों के अधिक सम्पर्क में रहने वाली नौकरशाही ही अंग्रेजी माध्यम से अपने बालकों को शिक्षा दिलाती थी।
अंग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का और भी अधिक प्रचार हुआ। समाज में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया है। यद्यपि अंग्रेजी माध्यम के शिक्षा संस्थान जनता को अनेक प्रकार से लूट रहे हैं, फिर भारतीय जनता उधार लेकर भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही अपने बालकों के प्रवेश दिलाने में गर्व समझती है।
सभी शिक्षाविद इस विषय पर एकमत हैं कि मातृभाषा ही शिक्षा का एकमात्र उचित माध्यम हैं, फिर भी जनता इसे सुनने के लिए तैयार नहीं है। सोचने की बात है कि विषय को समझने से पूर्व माध्यम अतिरिक्त कोई और भाषा नहीं हो सकती।। की भाषा का ज्ञान भलीभाँति होना चाहिए। ऐसा माध्यम मातृभाषा के प्रायः देखा जाता है कि अपनी मातृभाषा छोड़कर अंग्रेजी या किसी अन्यभाषा के माध्यम से शिक्षा पाने वाले छात्रों को प्रथम से सप्तम कक्षा तक कुछ भी समझ में नहीं आता, वे केवल रटने का सहारा लेते हैं। प्रश्नों के उत्तर रटकर वे शब्द-शब्द उत्तर लिख सकते हैं पर उनके निहित भाव को समझने में असमर्थ रहते हैं। सातवीं कक्षा में पहुँचने पर वे उस भाषा में समझने लगते हैं।
पर क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इन छोटी आयु के बालकों को विषय समझने योग्य क्षमता प्राप्त करने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ा होगा। इसके विपरीत मातृभाषा द्वारा शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी को साथ ही साथ विषय का ज्ञान भी होता जाता है। उसे समझने के पश्चात वह अपने शब्दों में भी भाव को प्रकट कर सकता है। अन्य भाषा के माध्यम की भांति उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती।
यहाँ प्रश्न आता है कि भारत में प्रत्येक प्रान्त में अलग-अलग भाषाएँ हैं। अतएव एक प्रांत से दूसरे प्रान्त में जाने वाले को माध्यम की कठिनाई होगी। इस कारण सभी को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने में इतनी कठिनाई नहीं होगी। पर यह ठीक नहीं है। किसी भी भारतीय को दूसरी भारतीय भाषा सीखने में उतनी कठिनाई नहीं होती जितनी अंग्रेजी को सीखने में होती है। सभी भारतीय भाषाओं की प्रकृति एक जैसी है। जब कि अंग्रेजी भाषा की प्रकृति उनके विपरीत है। अतएव अंग्रेजी के स्थान पर उस प्रान्त की भाषा द्वारा शिक्षा प्राप्त करना अधिक सरल होगा।
वास्तव में भारतवर्ष में कुछ चुने हुए घरानों के अंग्रेजी मोह कारण भारतीय छात्रों पर अंग्रेजी माध्यम का भार पड़ा हुआ है। लोग अंग्रेजी के कारण अंग्रेजों के राज्य में उच्च पदों पर कार्यरत थे. उन्होंने अंग्रेजी को ही मातृभाषा मान लिया। उनके घरों में घोल बातचीत भी अंग्रेजी में ही होती है। ऐसे लोग अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजी को नहीं हटाना हैं। अंग्रेजी में दक्षता के कारण उनकी सन्तानों को सुविधा रहती है। वे स्वार्थ के कारण सामान्य जनता की चिन्ता नहीं करते।
वे तर्क देते हैं कि अंग्रेजी एक उन्नत भाषा है। वह सभी विषयों का ज्ञान देने में समर्थ है। भारतीय भाषाएँ इतनी उन्नत नहीं है। उनका यह तर्क भी खोखला है। यदि भारतीय भाषा में शिक्षा का माध्यम रखाजाए उसी में काम काज किया जाए तो भाषा भी उन्नत हो जाती   है।
किसी भाषा का अध्ययन करना और बात है, तथा उसका शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग करना अलग बात है। इसमें किसी भी भाषा के भलीभाँति अध्ययन के विरोध में कोई बात नहीं कहीं गई। है। शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग करने का विरोध है।
इसमें किसी को भी सन्देह नहीं रहना चाहिए कि सभी अवस्थाओं में मातृभाषा ही शिक्षा का श्रेष्ठतम माध्यम है। किसी भी भाषा को अशक्त कहना स्वार्थ और भ्रम ही कहा जाएगा।