सह शिक्षा के लाभ, हानिया


सह शिक्षा से तात्पर्य है कि सभी आयु के बालक और बालिकाएँ। एक साथ एक ही कक्ष में बैठकर शिक्षा प्राप्त करें बालक और बालिकाओं के लिए पृथक पृथक कक्षाएँ रखने की आवश्यकता न हो।
भारतवर्ष में इस प्रकार की शिक्षा का प्रचलन प्राचीन काल से नहीं है। कुछ वर्ष पूर्वतक स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करने में रुचि ही नहीं रखती थी। अतएव इसकी समस्या ही नहीं थी। लगभग एक शताब्दी पूर्व ही स्त्रियों को शिक्षा देने पर जोर दिया जा रहा है। भारत में अंग्रेजी राज्य स्थापित होने पर पश्चिम से संपर्क गहरा हुआ। पाश्चात्य रीति नीति ने भारत में भी प्रवेश किया। पश्चिम की सभी अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ इस देश में भी प्रवेश पाने लगी।
भारतीय सामाजिक संस्कार तथा पाश्चात्य संस्कारों में बड़ा भेद है। जिन संस्कारों का पाश्चात्य देशों में सम्मान किया जाता है, भारत में उनको गलत माना जाता है। उदाहरण के तौरपर भारत में अपने पुत्र पुत्री के लिए वर-वधू का चयन माता-पिता करते थे, तो पाश्चात्य देशों में किशोर या किशोरियां अपना जीवन साथी स्वयं चुनते हैं। इसीलिए वहाँ सह शिक्षा अनिवार्य मानी गई। यहीं से वे लोग एक दूसरे से परिचित होकर, अपने लिए स्वयं साथी हूँढ सकते हैं। भारत में ऐसी कोई विवशता नहीं है।
पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से भारत में भी सह शिक्षा का प्रय होने लगा। यहाँ भी प्रेम विवाह होने लगे। भारतीय समाज में भी शिक्षा की पाठशालाएँ खुलने लगीं। आज स्त्री और पुरुष की सा का बोलबाला है। तो सह शिक्षा का विरोध क्यों किया जाए।
भारत का वातावरण गर्म है जबकि यूरोप का शीत है। धान विवाह की आयु कम है। यहाँ के वातावरण में परिपक्वता ज प्राप्त होती है। अतएव सह शिक्षा के कारण किशोर एवं किशोरियों में आकर्षण होने लगता है। यदि अनुशासन में कमी पाईगई तो कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं कर पाता। सह शिक्षा में उछृखल जीवन हो जाने की संभावना बनी रहती है।
प्राथमिक पाठशालाओं में सहं शिक्षा कोई समस्या उत्पन्न नहीं करती। समाज में समान भावना विकसित करने, एक साथ रहने का अभ्यास बढ़ाने में यह सहायक होती है। समाज के ऊपर भी एक काम के लिए दो पाठशालाओं को चलाने का भार नहीं पड़ता। उच्च कक्षाओं में अवश्य सहशिक्षा के कारण समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावनाएँ रहती हैं। यद्यपि यह ऐसा काल होता है जहाँ एक दूसरे के साथ रहने एवं काम करने का अभ्यास होता है। सह शिक्षा वाली पाठशालाओं में अनुशासन अच्छा हो तो कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। बालक बालिकाओं में स्वतः ही संयम और अनुशासन की भावना विकसित हो जाती है। दोनों ही जीवन के क्षेत्र में अपना उत्तरदायित्व समझने लगते हैं।
आज भारत के शिक्षित समाज में पाश्चात्य संस्कार प्रभाव डाल चुके हैं। विवाहादि में भी उनके परिवारों को उतनी ही स्वतंत्रता मिलचुकी है। सहशिक्षा देश की आवश्यकता बनती जारही है। अतएव यदि ऐसी दशा में सहशिक्षा की संस्थाएँ फलती फूलती है। तो सावधानी आवश्यक है। पाठशालाओं का प्रबन्ध कुशल होना चाहिए। पाठशाला के समय में छात्र और छात्राओं को व्यस्त रखना चाहिए। उन्हें स्वच्छंद घूमने फिरने का समय नहीं मिलना चाहिए।
उच्च शिक्षा का स्तर आते आते छात्र और छात्राएँ परिपक्व हो जाती हैं। वे अपना भला बुरा समझने लगते हैं। अतएव सहशिक्षा में यहाँ उतनी सावधानी बरतने की आवश्यकता नहीं होती।
निष्कर्ष यह कि सहशिक्षा आज के युग की आवश्यकता है, पर सहशिक्षा की संस्थाओं में अनुशासन रहना अनिवार्य हैं।