शिष्टाचार


अच्छे आचरणों वाला व्यक्ति समाज का आभूषण माना जाता है। इसके विपरीत अशिष्ट व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप होता है। व्यक्ति आदतों का एक समूह होता है। एक शिष्ट व्यक्ति शिष्ट आदतों का समूह होता है। हमारा आचरण शिष्ट होनेसे सभी लोग मिलने जुलने की इच्छा करते है। अशिष्ट व्यक्ति से समाज घृणा करता है। हमारे शिष्ट आचरण हमें समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाने में सक्षम होते हैं।
कोई भी व्यक्ति बात करने के ढंग से प्रभावित होता है। शिष्ट संभाषण अलंकार के समान होता है। मीठी एवं मधुर वाणी से कही गई बात हृदय में सहानुभूति उत्पन्न करती है। इसके विपरीत कट या कठोर भाषा में किया गया वार्तालप बनते हुए कार्य को भी बिगाड़ देता है।
स्वामी राम तीर्थ अमेरिका जा रहे थे। जहाज तट के समीप पहुँचने पर हलचल मच गई। स्वामीजी इस हल चल में भी चुपचाप बैठे थे। एक अमेरिकी यात्री से न रहा गया। उसने पूछ ही लिया – “आपका सामान कहाँ हैं। स्वामीजी ने उत्तर दिया – ‘राम अपने साथ उतना ही सामान रखता है, जितना स्वयं उठा सके।”, उसने फिर पूछा – “आपके पास रुपया पैसा तो अवश्य ही होगा। स्वामी जी ने शिष्ट एवं संयत भाषा से उत्तर दिया – “नहीं, राम रुपए पैसे का स्पर्श नहीं करता”। अमेरिकन ने पूछा – “तो आपकी सहायता करने वाले आप के मित्र यहाँ होंगे?” वे कौन है” स्वामी जी ने प्रश्नकर्ता के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – “आप”। वे सज्जन शिष्ट और संयत व्यवहार पर मुग्ध हो गए। वे स्वामीजी को अपने घर ले गए। उनके शिष्ट और संयत व्यवहार ने उनको अपना भक्त और प्रशंसक बना लिया। वे अमेरिका के अपने प्रवास में उन्हीं के अतिथि बने रहे।
तो देखा अपने शिष्टाचार का – प्रभाव। एक अपरिचित भी विदेश में शिष्टाचार के प्रभाव से सच्चा मित्र बन गया। शिष्टाचार सभी के लिए अनिवार्य है। यह धन, ऐश्वर्य, सौन्दर्य अथवा योग्यता से भी अधिक मूल्यवान सम्पत्ति है। मनुष्य की वाणी एवं आचरण का शिष्टाचार उसका सच्चा आभूषण है।
यदि कोई व्यापारी शिष्ट और नम्र नहीं है तो ग्राहक उसके पास नहीं जाते। अशिष्ट कर्मचारियों के व्यवहार से जनता उसकी बुराई करने लगती है। वह बदनाम हो जाता है। किसी अध्यापक को यदि विद्यार्थियों से आदर पाना है तो उसे विद्यार्थियों के साथ शिष्टता से व्यवहार करना चाहिए। उसी प्रकार कोई विद्यार्थी गुरु की कृपा प्राप्त करना चाहता है तो उसे भी अपना व्यवहार एवं बातचीत शिष्टता पूर्वक करनी चाहिए। कुछ घरानों में शिष्टाचार पारम्परिक रूप से पाया जाता है।
उनके मालिक अपने नौकरों को भी ‘आप’ शब्द से सम्बोधित करते हैं। घर के वयस्क सदस्य भी अपने से छोटों को ‘आप’ कहकरही संबोधित करते हैं। उन घरानों का शिष्ट संभाषण सुनकर मन प्रसन्न हो जाता है। | शिष्टाचरण में खर्च तो कुछ नहीं होता पर लाभ ही लाभ दिखाई देता है। शिष्टाचारी को हर कोई चाहता है। डाक्टर जानसन का कथन है – शिष्ट और अशिष्ट व्यक्ति में यही अन्तर है कि प्रथम हर व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करता है। जब कि द्वितीय सबकी घृणा का पात्र बनता है। यह कथन सत्य ही है कि शिष्टाचार से मानव बनता है और इसके अभाव से वह व्यक्ति ही रहता है।
शिष्टाचार व्यक्ति को आकर्षक बनाता है। उसके स्वभाव में श्रेष्ठता तथा आत्मा में सौंदर्य की वृद्धि करता है। शिष्टाचार के बिना किसी मनुष्य का आचरण गलत समझा जा सकता है। यदि कोई धूर्त और अपने व्यवहार में शिष्ट और संयत है, तो उसे भद्र पुरुष समझा जाता है, शिष्टाचार में जादू का सा प्रभाव होता है।