वर्षा ऋतु


प्रचण्ड धूप से तपती हुई धरती आग उगलती है। लोग व्याकुल होकर आकाश की ओर देखने लगते हैं। पानी की कमी से सभी परेशान हो जाते हैं। ऐसे ही समय में पुरवाई चलने लगती है। आकाश पर बादल छा जाते हैं। प्यासी भूमि की प्यास बुझाने वर्षा ऋतु का आगमन होता है।
प्रथम वर्षा ही वातावरण को परिवर्तित कर देती है। प्रचण्ड धूप शीतलता में बदल जाती है। पशु-पक्षियों की प्यास बुझने लगती है। सूखे मुरझाये पेड़ पौधों में नव जीवन का संचार हो जाता है। तालाबों में पानी भरने के साथ साथ मेडकों की टर्र-टर्र सुनाई देने लगती है। तुलसी दास जी का वर्षावर्णन उनकी चौपाई – “दादुर धुनि चहुँ ओर सुहाई, वेद पढ़हि जनु बटु समुदायी।” द्वारा मुखरित हो उठता है।
सूखी धरती पर वर्षा की बूंदें पड़ते ही सोंधी सुगन्ध उठने लगती है। सूखे झाड़ झंखाड हो भरे होने लगते हैं।
वर्षा ऋतु का समय चार महीने का होता है। जुलाई से प्रारंभ होकर अक्टूबर मास तक बरसात रहती है। इन चार महीनों में बरसात से इतना पानी मिल जाता है कि वर्ष भर हम उसका उपयोग करते रहते हैं। खेतों में फसल बरसात पर ही निर्भर रहती है। यदि पर्याप्त मात्रा में वर्षा न हो तो हमें भोजन भी नहीं मिले।
वर्षाकाल में वर्षा का पानी हम कई प्रकार से संग्रहित करके रखते हैं। कुछ पानी भूमि में चला जाता है। इस पानी को हम कुओं के द्वारा वर्षभर प्राप्त करते रहते हैं। कुछ पानी तालाबों में इकट्ठा हो जाता है। पशु पक्षी इसका उपयोग करते हैं। खेतों की सिंचाई के लिए भी बड़े तालाबों का पानी उपयोग में आता है। कुछ पानी नदियों में प्रवाहित हो जाता है। नदियों के पानी को बाँध बना कर रोक लिया जाता है। एक नदी पर कई कई स्थानों पर बाँध बनाए जाते हैं। नहरों द्वारा यह पानी खेतों की सिंचाई के लिए दिया जाता है।
यूँ तो सभी ऋतुओं की अपनी अपनी महत्ता है, पर वर्षा ऋतु का महत्व विशेष ही है। जीवन की दो उपयोगी आवश्यकताओं – आहार एवं पानी की पूर्ति वर्षा से ही होती है। यदि समय पर वर्षा न हो या पर्याप्त वर्षा न हो, तो अकाल पड़ जाता है। अन्न पैदा ही नहीं होता। मानव तो मानव पशु पक्षी तक भूखे प्यासे मरने लगते हैं।
वर्षा प्रारंभ होते ही किसान का काम प्रारंभ हो जाता है। वह दिनभर खेतों पर रहकर बैलों की सहायता से खेत जोतने लगता है। उसकी दिन चर्चा व्यस्त हो जाती है। जुलाई से अक्टूबर तक उसे दिन रात खेतों में रहना पड़ता है। जोतना, बोना, नराई करना रखवाली करना, खेत काटना खलिहान बनाना तथा अनाज अलग कर घर ले जाने तक किसान का जीवन व्यस्त रहता है।
वर्षा उचित समय उचित मात्रा में होने से ही हम वर्ष भर आनंद से रह सकते हैं। अनावृष्टि और अतिवृष्टि दोनों ही फसल के लिए हानि कारक हैं। समय पर वर्षा न होने से, अनावृष्टि के कारण बोया हुआ बीज भी भूमि खाजाती है। पौधा ही अंकुरित नहीं होता। किसान को बीज की लागत भी नहीं आती। अतिवृष्टि से खड़ी हुई फसल सड़जाती है। नदियों में बाढ़ आजाती है। नदियों की बाढ़ से किनारों मरजाते हैं। पर के खेत उजड़ जाते हैं। अनेक मनुष्य और पशु बाढ़ में बहकर आशय यह कि वर्षाऋतु देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। पर अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि दोनों ही हानिकारक हैं। समय पर उचित वर्षा ही देश का कल्याण कर सकती है।