वन महोत्सव


हम प्रतिवर्ष वर्षाऋतु में वनमहोत्सव सप्ताह मनाते हैं। इस महोत्सव में पाठशाला एवं कालिजों में वृक्ष लगाने का कार्यक्रम रहता है। जहाँ कहीं भी उपयुक्त स्थान मिलता है, वहीं वृक्षों का आरोपण कर दिया जाता है। वर्षाऋतु होने के कारण वृक्षों को पानी मिलता है। कुछ वृक्ष बढ़जाते हैं। कुछ नष्ट भी हो जाते हैं।
हमारे देश में वृक्षों का लगाना एक धार्मिक कार्य मानते हैं। जब कभी किसी उत्सव का समय आता है, हम वृक्ष लगाते हैं। इन वृक्षी से हमें जितनी सहायता मिलती है, उतनी किसी और वस्तु से नहीं। दुर्भाग्य से इधर कुछ दिनों से हमने उसके महत्व को भुला दिया है।
गत कई वर्षों में इतने वृक्ष कट गए हैं और उन्हें इतनी निर्दयता से काटा गया है कि उनके न रहने से देश को जो हानि हो रही है उसका वर्णन करना कठिन है। देश की भलाई के लिए हमको जानना आवश्यक है कि वृक्षों से हमें क्या लाभ मिलते हैं?
वृक्ष लगाने का पहला लाभ यह है कि हमारी भूमि को इनके कारण पानी मिलता है। अगर वृक्ष न हों तो जो पानी भूमि पर गिरता है वह व्यर्थ चला जाता है। उससे कोई लाभ नहीं होता। अगर वृक्ष पर्याप्त संख्या में हो, तो वे पहाड़ से आते हुए पानी को रोकने में सहायक होते हैं। यदि पानी को रोकने का कोई साधन न हो तो पानी बाढ़ के रूप में बर्बादी फैलाते हुए समुद्र की ओर बढ़ता चला जाता है। यदि वृक्ष हों तो यह रुक जाता है। इसका लाभ यह होता है कि वहाँ की भूमि को पानी के साथ साथ वृक्षों की खाद भी मिल जाती है।
आज हमारे देश के बहुत से भागों में वर्षा कम हो रही है। वृक्षों के काटेजाने का ही यह परिणाम है कि अनेक स्थानों पर जितना पानी पहले बरसता था उतना अब नहीं बरस रहा।
कहा जाता है कि राजस्थान में जो मरु भूमि है वह प्रतिवर्ष फैलती जा रही है। यदि यही क्रम जारी रहा तो परिणाम यह भी हो सकता है कि भारत का बहुत सा भूभाग रेत का समुद्र बन जाए।
इस भयानक घटना से बचने के लिए, देश को पर्याप्त खाद और पानी मिलने के लिए, समय पर वर्षा होने के लिए यह आवश्यक है कि हम वृक्ष लगाएं। हमें चाहिए कि हम जंगलों को फिर से हरा भरा करदें। ऐसा करने से पानी की कमी दूर हो जाएगी। यह प्रसन्नता की बात है कि कुछ दिनों से हम लोगों ने इस ओर ध्यान दिया है।
किस प्रकार के वृक्ष लगाए जायें – यह सोचने का विषय है। कछ वृक्ष ऐसे भी लगाने चाहिए जो केवल जलाने के काम के ही हों। जलाने की लकडी की हमारे देश में बहुत आवश्यकता है। इसके अभाव में हम पशुओं के गोबर को ईधन बना कर जला डालते हैं। जो गोबर हमें मिलता है, उसको खाद के रूप में प्रयोग करने से भमि की उपज बढेगी, खाद्यान्न की कमी को पेड़ लगाने से पूरा किया जा सकता है।
वृक्ष लगाना तो ठीक है पर जो वृक्ष लगाए जाते हैं, उनके जीवित रहने का भी प्रबन्ध होना चाहिए। वृक्षों को लगाकर उनको जीवित रखने का उपाय न करना उनकी हत्या करने के समान होगा। यह महान पाप कहलाएगा। एक पौधा तैयार करने पर कुछ खर्च होता है। यदि करोड़ों वृक्ष लगाकर उनको जीवित रखने की उपाय न किया जाए तो यह अपव्यय कहलाएगा। इससे देश की बड़ी हानि होगी। वृक्ष लगाना आसान है पर उसे लगाकर जीवित रखना कठिन है।
वनमहोत्सव तो वर्ष में एक बार मनाया ही जा रहा है। पर इसके अतिरिक्त भी वृक्ष लगाए जाएं तो अलग से वनमहोत्सव सप्ताह रखने की आवश्यकता ही नहीं होगी। हमारे घरों में कोई न कोई उत्सव होते ही रहते हैं। हर उत्सव के अवसर पर हम कोई पुण्य कार्य करते रहें। विवाह के समय, मुण्डन के समय वृक्ष लगाने का पुण्य कार्य करने की परम्परा बना लीजाए तो स्वयमेव ही यह कार्य वर्ष भर चलता रहेगा। यह काम जो प्रारंभ हो चुका है उसको निरन्तर जारी रखना आवश्यक है |