साम्प्रदायिक एकता


भारत में अनेक सम्प्रदाय साथ साथ रहते हैं। हिन्दू मुस्लिम सिख, ईसाई, पारसी, जैन बौद्ध आदि। सभी सम्प्रदाय मिल जुलकर रहते हैं। पर हिन्दू और मुस्लिम ही समय समय पर आपस में झगड़ते रहते हैं। इस टकराव को ही आज साम्प्रदायिकता का नाम दिया जा रहा है।
राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता परस्पर विरोधी हैं। जब तक भारत की सम्पूर्ण जनता राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत नहीं हो जाती, तब तक संकीर्णता का प्रभाव रहेगा। असहिष्णुता साम्प्रदायिक तनाव को जन्म देती रहेगी।
मुगलों के राज्य में उनकी शक्ति के कारण हिन्दुओं को झुकना पड़ा। इस्लाम के नाम पर जो अत्याचार हिन्दुओं पर किए गए वे इतिहास बन गए हैं। हिन्दुओं के हृदयों में उनकी छाप अमिट होगई है। स्वतंत्र भारत में वे उसकी पुनरावृत्ति नहीं होने देना चाहते।
अंग्रेजों ने अपने शासन काल में इसी विद्वेश का लाभ उठाया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति की कामना को रोकने के लिए हिन्दू-मुसलमानों में भेद भड़काकर वे अपनी जड़ें जमाए रहे। अंग्रेजों के शासन काल में बड़े बड़े सांप्रदायिक दंगे होते रहे। वे कभी एक पक्ष को भड़का देते थे, तो कभी दूसरे को। इस प्रकार उनके शासन में साम्प्रदायिक एकता स्थापित न हो सकी।
महात्मा गांधी ने इस स्थिति को समझा। उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भावना बढ़ाने के लिए अपना प्रयोग किया। उन्होंने अपनी प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के ग्रंथों से उचित अंश चुनकर पढ़ना पढ़ाना प्रारंभ किया। वे चाहते थे कि सभी सम्प्रदाय एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करें। यदि वे एक दूसरे के धर्म ग्रंथ स्वीकार नहीं करना चाहते तो, कम से कम उनके सुनने की सहिष्णुता तो पैदा करें। ऐसा करते करते एक दूसरे के धर्म का आदर करना तो सीख जाएंगे। जब उन्हें ज्ञात होगा कि सभी धर्मों की मूल भावना एक ही है तो आपसी मेल जोल बढ़ेगा विद्वेश की भावना मिटेगी।
यदि हम विद्वेश का मूल कारण खोजें तो एक दूसरे सम्प्रदायों में विपरीत सांस्कृतिक चर्याएं सामने आती हैं। हिन्दू यदि पूर्व दिशा में पूजा करते हैं तो मुसलमान पश्चि में, हिन्दू यदि बाएँ से दाएँ लिखते हैं, तो मुसलमान दाएँ से बाएँ, हिन्दुओं के तीर्थ स्थान देश में ही हैं. तो मुसलमानों के विदेश में। हिन्दुओं के प्रेरणा स्त्रोत भारत में ही हैं, तो मुसलमानों के मक्का मदीने में। हिन्दू सिर पर चोटी रखते हैं तो मुसलमान ठोड़ी पर दाढ़ी। ये सभी एक दूसरे के विपरीत शैलियाँ आपसी एकता में बाधा उत्पन्न करती हैं। मुसलमान देश का राष्ट्र गीत “वंदेमातरम” भी आत्मसात नहीं कर पाए हैं। वे भारत को मातृभूमि मान कर उसके सामने सिर झुकाने में अपमान समझते हैं।
इतने अधिक वैषम्यों को मिटाकर एकता की भावना उत्पन्न करना कष्ट साध्य है। मनोवृत्तियाँ आसानी से बदली नहीं जाती। वर्षों अथक प्रयत्न करने से ही ऐसा हो सकता है।
भारत सदा से ही विदेशियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। इस भूमि में समन्वयता की शक्ति रही है। भारतीय संस्कृति ने बाहरी संस्कृति को कुछ ले देकर आत्मसात कर लिया। मुसलमानों ने कभी हृदय पूर्वक स्वयं को भारतीय नहीं माना। वे स्वयं को सदा विदेशी समझते रहे। परिणाम स्वरूप भारतीय संस्कृति उन पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकी। दोनों संस्कृतियाँ यहाँ सौतेली बहिनों के समान पनपती रहीं।
समय समय पर इनकी दूरी कम करने के प्रयास होते रहे हैं। सूफी सन्त कबीर और जायसी आदि ने दूरी को कम करने के प्रयत्न किए पर सफलता प्राप्त न हुई।
भारत सरकार धर्म निरपेक्ष है। अल्प संख्यकों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ देती रहती है फिर भी साम्प्रदायिक तनाव की आशंका सदैव ही बनी रहती है। दोनों सम्प्रदायों के गुंडा तत्व सदा ही दंगा करने के अवसर खोजते रहते हैं। धर्मान्ध नेता अपने अपने सम्प्रदायों में भावनाओं को भड़काते रहते हैं। साम्प्रदायिक दंगों में भाग लेने वालों को प्रशासन कभी दण्ड नहीं देता। उन्हें पकड़ कर राजनीतिज्ञों के प्रभाव में आकर मुक्त कर दिया जाता है।
इस स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न उपाय करने होंगें। साम्प्रदायिक दंगों के अपराधियों को कठोर दण्ड दिया जाय। दंगों पर कठोरता पूर्वक नियंत्रण किया जाए। राजनीतिक दल साम्प्रदायिक तत्वों से दूरी बनाए रखें। नगर के गुण्डा तत्वों पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए। धार्मिक दुष्प्रचार का गुप्तचरों द्वारा पता लगाकर ऐसे तत्वों को दण्डित किया जाए। सर्व धर्म सम्मेलनों का आयोजन कर सभी धर्मों की मूल भावनाओं को उभारा जाय। सभी को एक दूसरे के धर्म का आदर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। एक दूसरे के त्यौहारों में सम्मिलित होकर आपसी सौहार्दय बढ़ाया जाए।
इसके अतिरिक्त शासन जब तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी एक सम्प्रदाय के साथ पक्षपात करता रहेगा तब तक सांप्रदायिक सद्भाव का स्वप्न साकार नहीं होगा।