अपना घर

कहते हैं कि घरों में घर अपना घर । सच है अपना घर अपना ही होता है । अपने घर में चाहे सारी सुख-सुविधाएँ न भी प्राप्त हों तो भी वह अच्छा लगता है । जो स्वतन्त्रता यक्ति को अपने घर में होती है वह किसी बड़े-बड़े आलीशान घर में भी नहीं प्राप्त होती। पराये घर में जो झिझक, असुविधा होती है वह अपने घर में नहीं होती । अपने घर में व्यक्ति अपनी मर्जी का मालिक होता है । दूसरे के घर में उस घर के स्वामी की इच्छानुसार अथवा उस घर के नियमों के अनुसार चलना होता है । अपने घर में आप जो चाहें करें जो चाहें खायें, जहाँ चाहें बैठे, जहाँ चाहें लेटें पर दूसरे के घर में यह सब सम्भव नहीं। इसीलिए तो किसी ने कहा है—जो सुख छज्जू दे चौबारे वह न बलख, न बुखारे । शायद यही कारण है कि आजकल नौकरी करने वाले प्रतिदिन मीलों का सफर करके नौकरी पर जाते हैं परन्तु रात को अपने घर वापिस आ जाते हैं । पुरुष तो पहले भी नौकरी करने बाहर जाते थे । आजकल स्त्रियाँ भी नौकरी करने घर से कई मील दूर जाती हैं परन्तु सभी अपने-अपने घरों को लौटना पसन्द करते हैं । मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी तक भी अपने घर के महत्त्व को समझते हैं । सारा दिन जंगल में चरने वाली गाएं, भैंसे, भेड़, बकरियाँ संध्या होते ही अपने-अपने घरों को लौट आते हैं । पक्षी भी दिनभर दाना दुनका चुगकर संध्या होते ही अपने-अपने घौंसलों (घरों) को लौट आते हैं । घर का मोह ही उन्हें अपने पौंसलों में लौट आने के लिए विवश करता है क्योंकि जो सुख अपने घर में मिलता है वह और कहीं नहीं मिलता । इसीलिए कहा गया है कि घरों में घर अपना घर ।
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