भागवत चन्द्रशेखर

भागवत सुब्रह्मण्यम चन्द्रशेखर को भागवत चन्द्रशेखर नाम से ही जाना जाता है। वह भारत की प्रसिद्ध स्पिन चौकड़ी के सदस्यों में से एक रहे। उनके मित्रों के बीच वह चन्द्रा नाम से पुकारे जाते थे। वह भारतीय क्रिकेट में जादूगर के समान जाने जाते थे। उनके एक प्रयास से मैच हारने की स्थिति से जीतने की स्थिति में पहुंच जाता था और बाज़ी पलट जाती थी। ऐसा उन्होंने कई बार भारत के लिए कर दिखाया। जिनमें से एक उदाहरण है-जो भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक यादगार घटना है-जब भारत ने 1971 में ओवल में इंग्लैंड के विरुद्ध प्रथम जीत हासिल की थी। उन्हें ‘पद्मश्री तथा ‘अर्जुन पुरस्कार भी प्रदान किया गया। 1972 में उन्हें विज़डन द्वारा ‘क्रिकेटर ऑफ द ईयर’ चुना गया।
भागवत चन्द्रशेखर भारत की प्रसिद्ध स्पिन चौकड़ी के सदस्यों में से एक रहे। चन्द्रशेखर जब बंगलौर के नेशनल कॉलेज में अंडरग्रेजुएट विद्यार्थी ही थे, तब उन्होंने केरल के विरुद्ध कर्नाटक टीम में रणजी ट्रॉफी के लिए खेला था। यह 1963-64 का वर्ष था। यह वर्ष चन्द्रशेखर कभी नहीं भुला सके क्योंकि इस वर्ष उन्होंने अपने प्रदेश जोन की ओर से दलीप ट्रॉफी और ईरानी ट्रॉफी के लिए भी खेला था और फिर देश की टीम में भी शामिल हो गए थे।
उस वक्त इंग्लैंड के माइक स्मिथ की टीम भारत के दौरे पर थी। चन्द्रशेखर को 19 वर्ष की आयु में पटौदी की कप्तानी में बम्बई में खेलने के लिए शामिल किया गया। उन्होंने उस मैच में 5 विकेट लिए। यह उनके क्रिकेट जीवन की शुरुआत थी। उन्होंने 17 वर्षों तक क्रिकेट खेला। उन्होंने अन्तिम मैच 1979-80 में पकिस्तान में खेला। इस दौरान चन्द्रशेखर ने 58 टेस्ट मैच खेले और 242 विकेट लिए। इनमें उनका औसत 29.74 रहा।
चन्द्रशेखर ने 16 बार एक पारी में पांच विकेट, और दो बार मैच में 10 या अधिक विकेट लेने का आश्चर्यजनक कारनामा भी किया।
यद्यपि चन्द्रशेखर बचपन में पोलियो का शिकार हो गए थे, जिसके कारण उनका सीधा हाथ प्रभावित हुआ था। उनकी दाहिने हाथ की कलाई में इसका प्रभाव अधिक था, लेकिन इसी के प्रभाव के कारण चन्द्रशेखर की कलाई गंद फेंकते वक्त एक बार ज्यादा ट्विस्ट हो जाती थी। वह सामान्य प्रकार के स्पिनरों से भिन्न रहे। वह वास्तव में सबसे तेज़ लेग-ब्रेक बॉलर रहे, जिसके कारण अच्छे-अच्छे बल्लेबाज़ आसानी से आउट हो जाते थे।